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जो भी करो आदर्श करो

👉 जो भी करो आदर्श करो  :-

🔴 एक व्यक्ति कबीर के पास गया और बोला- मेरी शिक्षा तो समाप्त हो गई। अब मेरे मन में दो बातें आती हैं, एक यह कि विवाह करके गृहस्थ जीवन यापन करूँ या संन्यास  धारण करूँ? इन दोनों में से मेरे लिए क्या अच्छा रहेगा यह बताइए?

कबीर ने कहा -दोनों ही बातें अच्छी है जो भी करना हो वह उच्चकोटि का करना चाहिए। उस व्यक्ति ने पूछा- उच्चकोटि का कैसे? कबीर ने कहा- किसी दिन प्रत्यक्ष देखकर बतायेंगे वह व्यक्ति रोज उत्तर की प्रतीक्षा में कबीर के पास आने लगा।

🔴 एक दिन कबीर दिन के बारह बजे कपड़ा बुन रहे थे। खुली जगह में प्रकाश काफी था फिर भी कबीर ने अपनी धर्म पत्नी को दीपक लाने का आदेश दिया। वह तुरन्त जलाकर लाई और उनके पास रख गई। दीपक जलता रहा वे कपड़ा बुनते रहे।

🔵 सायंकाल को उस व्यक्ति को लेकर कबीर एक पहाड़ी पर गए। जहाँ काफी ऊँचाई पर एक बहुत वृद्ध साधु कुटी बनाकर रहते थे। कबीर ने साधु को आवाज दी। महाराज आपसे कुछ जरूरी काम है कृपया नीचे आइए। बूढ़ा बीमार साधु मुश्किल से इतनी ऊँचाई से उतर कर नीचे आया। कबीर ने पूछा आपकी आयु कितनी है यह जानने के लिए  नीचे बुलाया है। साधु ने कहा अस्सी बरस। यह कह कर वह फिर से ऊपर चढ़ा। बड़ी कठिनाई से कुटी में पहुँचा। कबीर ने फिर आवाज दी और नीचे बुलाया। साधु फिर आया। उससे पूछा- आप यहाँ पर कितने दिन से निवास करते है? उनने बताया चालीस वर्ष से। फिर जब वह कुटी में पहुँचे तो तीसरी बार फिर उन्हें इसी प्रकार बुलाया और  पूछा- आपके सब दाँत उखड़ गए या नहीं? उसने उत्तर दिया। आधे उखड़ गए। तीसरी बार उत्तर देकर वह ऊपर जाने लगा तब इतने चढ़ने उतरने से साधु की साँस फूलने लगी, पाँव काँपने लगे। वह बहुत अधिक थक गया था फिर भी उसे क्रोध तनिक भी न था।

🔴 अब कबीर अपने साथी समेत घर लौटे तो साथी ने अपने प्रश्न का उत्तर पूछा। उनने कहा तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में यह दोनों घटनायें उपस्थित है। यदि गृहस्थ बनाना हो तो ऐसा बनाना चाहिये जैसे मैं पत्नी को मैंने अपने स्नेह और सद्व्यवहार से ऐसा आज्ञाकारी बनाया है कि उसे दिन में भी दीपक जलाने की मेरी आज्ञा अनुचित नहीं मालूम पड़ती और साधु बनना हो तो ऐसा बनना चाहिए कि कोई कितना ही परेशान करे क्रोध का नाम भी न आवे।

कबीर साहब का पाप और गंगा स्नान के बारे में दोहा

कबीर साहब का पाप और गंगा स्नान के बारे में दोहा

पुरे वर्ष करते रहे,
एक एक करते पाप।
एक दिन गंगा नहाके,
करवा लेते माफ।

कहे कबीर समझाये,
वाह रे खूब है पापी।
आप ही करता पाप,
आपही मानता माफी।।

अर्थ -
पुरे साल भर पाप करतेे हो और गंगा में डुबकी लगाकर ये मान लेते हो की पाप धुल गए और मन पवित्र हो गया। आप पाप करते हो और गंगा में डुबकी लगाकर मान लेते हो की पाप धूल गए, माफ़ी मिल गयी।

कुछ सवाल -
1) क्या आप मानते है आप सालभर पाप करोगे और गंगा में साल में एक दिन डुबकी लगाकर पाप धुल जायेंगे?

2) इस तरह गंगा में डुबकी लगाकर आपकी अपराधी (guilt) की भावना दूर होगी?

3) गंगा में डुबकी लगाकर या दूसरा कोई भी कर्मकांड करकर आपको पापो से मुक्ति मिलेगी?

4) साल में एक दिन डुबकी लगाकर पाप धो लेंगे और फिर पुरे साल पाप करने के लिए तैयार और फिर गंगा में डुबकी लगाकर पाप धो लेंगे और फिर साल भर पाप करने के लिए तैयार.. क्या ये संभव है? क्या आप गंगा में डुबकी लगाकर अपने आपको पाप करने की permission दे रहे है? आप दुनिया को बेवकूफ बना सकते है, लेकिन अपने अंतर्मन को कैसे बेवकूफ बनाओगे?

5) कबतक आप केवल तन को धोकर पाप मुक्त बनने की बात करते रहोगे? 

तन से जादा मन से अंदर से धोना और अंतर्मन को अंदर से बदलना ये महत्वपूर्ण है।केवल तन धोने से feeling better होगा लेकिन getting better नही होगा। getting better के लिये मन को अंदर से बदलना पड़ेगा।