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यदि तुम अप्रसन्न हो तो इसका सरल सा अर्थ यह है कि

यदि तुम अप्रसन्न हो तो इसका सरल सा अर्थ यहहै कि तुम अप्रसन्न होने की तरकीब सीख गए हो। और कुछ नहीं! अप्रसन्नता तुम्हारे मन के सोचने के ढंग पर निर्भर करतीहै। यहां ऐसे लोग हैं जो हर स्थिति में अप्रसन्न होते हैं। उनके मन में एक तरह का कार्यक्रम है जिससे वे हर चीज को अप्रसन्नता में बदल देते हैं। यदि तुम उन्हें गुलाब की सुंदरता के बारे में कहो, वे तत्काल कांटों की गिनती शुरू कर देंगे। यदि उन्हें तुम कहो, "कितनी सुंदर सुबहहै, कितना उजला दिनहै!' वे कहेंगे, "दो अंधेरी रातों के बीच एक दिन, तो इतनी बड़ी बात क्यों बना रहे हो?'ली इसी बात को विधायक ढंग से भी देखा जा सकताहै; तब अचानक हर रात दो दिनों से घिर जातीहै। और अचानक चमत्कार होताहै कि गुलाब संभव होताहै। इतने सारे कांटों के बीच इतना नाजुक फूल संभव हुआ!

सब इस बात पर निर्भर करताहै कि किस तरह के मन का ढांचा तुम लिए हुए हो। लाखों लोग सूली लिए घूम रहे हैं। स्वाभाविक ही, निश्चित रूप से, वे बोझ से दबे हैं; उनका जीवन बस घिसटना मात्रहै। उनका ढांचा ऐसाहै कि हर चीज तत्काल नकारात्मक की तरफ चली जातीहै। यह नकारात्मक को बहुत बड़ा कर देताहै। जीवन के प्रति यह रुग्ण, विक्षिप्त, रवैयाहै। लेकिन वे सोचते चले जाते हैं कि "हम क्या कर सकते हैं? दुनिया ऐसी हीहै।'

नहीं, दुनिया ऐसी नहींहै! दुनिया पूरी तरह से तटस्थहै। इसमें कांटे हैं, इसमें गुलाब के फूल हैंै, इसमें रातें हैं, इसमें दिन भी हैं। दुनिया पूरी तरह से तटस्थहै, संतुलित--इसमें सब कुछहै। अब यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करताहै कि तुम क्या चुनते हो। इसी तरह से लोग इसी पृथ्वी पर नर्क और स्वर्ग दोनों ही पैदा करते हैं।

ओशो🌺🌺🌺

तुम्हारा है क्या जो तुम छोडोगे

💐 तुम्हारा है क्या जो तुम छोड़ोगे ?? 💐

एक संन्यासी मेरे पास आया और
उसने कहा, मैंने पत्नी-बच्चे सबका त्याग
कर दिया। मैंने उससे पूछा, वे तेरे थे कब? त्याग
तो उसका होता है जो अपना हो। पत्नी तेरी थी? सात
चक्कर लगा लिए थे आग के आसपास, उससे तेरी हो गई
थी? बच्चे तेरे थे? पहली तो भूल वहीं हो गई कि तूने
उन्हें अपना माना। और फिर दूसरी भूल यह हो गई
कि उनको छोड़कर भागा। छोड़ा वही जा सकता
है जो अपना मान लिया गया हो। बात कुल
इतनी है, इतना ही जान लेना है कि अपना
कोई भी नहीं है, छोड़कर क्या भागना है!
छोड़कर भागना तो भूल की ही पुनरुक्ति है।

जिन्होंने जाना, उन्होंने कुछ भी
छोड़ा नहीं। जिन्होंने जाना, उन्होंने
कुछ भी पकड़ा नहीं। जिन्होंने जाना, उन्हें
छोड़ना नहीं पड़ता, छूट जाता है। क्योंकि जब
दिखाई पड़ता है कि पकड़ने को यहां कुछ भी नहीं है,
तो मुट्ठी खुल जाती है।

~ ओशो ~

(एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन #20)

शांति पाने की कोशिश मत करे

शांति पाने की कोशिश मत करे,अशांति को स्वीकार कर ले-आप शांत हो जायेंगे। फिर दुनिया में कोई आपको अशांत नही कर सकता। अगर मैं अशांति के लिए राज़ी हू ,कौन मुझे अशांत कर सकता है?अगर मैं गाली के लिए तैयार हू तो कौन मेरा अपमान कर सकता है?मैं गाली के लिए राज़ी नही हू इसलिए कोई मेरा अपमान कर सकता है। मैं अशांति के लिए राज़ी नही हू इसलिए कोई भी अशांत कर सकता है।

❤ अगर हम ठीक से मन की प्रक्रिया को समझ ले,तो मन की प्रक्रिया को समझकर जीवन बदल जाता है।♥

प्रक्रिया ये है की मन हमेसा चीजों को दो में तोड़ देता है-मान-अपमान,सुख-दुःख,शांति-अशांति,संसार-मोक्ष। और कहता है एक नही चाहिए,अरुचिकर है,और एक चाहिए रुचिकर है-बस ये मन का खेल है।

❤इस मन से बचने के दो उपाय है-या तो दोनों के लिए राज़ी हो जाये-मन मर जायेगा। या दोनों को छोड़ दे,मन मर जायेगा। जो आपके लिए अनुकूल पड़े वैसा कर ले-अन्यथा आपके शांत होने का कोई उपाय नही है।*

जब तक आप शांत होना चाहते है,तब तक शांत न हो सकेंगे। जब तक सुखी होना चाहते है दुःख आपका भाग्य होगा, और जब तक मोक्ष के लिए पागल है,संसार आपकी परिक्रमा होगी। दोनों के लिए राज़ी हो जाये-मांग ही छोड़ दे,-कह दे जो होता है मैं राज़ी हू'।

इसका थोडा प्रयोग करके देखे-24 घंटे,ज्यादा नही। लड़ने का प्रयोग तो आप जन्मो से कर रहे है,एक 24 घंटे तय कर ले, की आज सुबह 6 बजे से कल सुबह 6 बजे तक जो भी होगा,उसको मैं स्वीकार कर लूँगा,जहाँ भी हो विरोध,द्वन्द नही खड़ा करूंगा।

करके देखे,24 घंटे में आपकी जिंदगी में एक नई हवा का प्रवेश होगा। जैसे कोई झरोखा अचानक खुल गया,और ताज़ी हवा आपकी जिन्दगी में आनी शुरू हो गई। फिर ये 24 घंटे कभी खत्म न होंगे। एक दफा इसका अनुभव हो जाये,फिर आप इसमें गहरे उतर जाएँगे।

❤कोई विधि नही है शांत होने की, शांत होना जीवन- दृष्टी है।कोई मैथड नही होता की भगवान का नाम जप लिया और शांत हो गये। अशांति को स्वीकार कर ले,दुःख को स्वीकार कर ले,मृत्यु को स्वीकार कर ले,फिर आपकी कोई मृत्यु नही है। " जिसे हम स्वीकार कर लेते है, उसके हम पार हो जाते हैं "....!!*
💖 💗 💚 💙 💜 ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤ ❤

मै एक कहानी पढ़ता था।

मैं एक कहानी पढ़ता था।
यूरोप का एक बहुत बड़ा विचारक हुआ, एडमंड बर्क। वह रोज सुनने जाता था एक पादरी को। पादरी ने एक दिन चर्च में कहा कि जो लोग पुण्यात्मा हैं और परमात्मा में भरोसा करते हैं, वे स्वर्ग जाते हैं। एडमंड बर्क खड़ा हो गया। उसने कहा, मुझे एक बात पूछनी है। आपने दो बातें कहीं, कि जो लोग पुण्यात्मा हैं, और परमात्मा में भरोसा करते हैं, वे स्वर्ग जाते हैं। मैं पूछता हूं कि जो लोग पुण्यात्मा हैं और परमात्मा में भरोसा नहीं करते, वे कहा जाते हैं? और मैं यह भी पूछना चाहता हूं कि जो परमात्मा में भरोसा करते हैं और पुण्यात्मा नहीं हैं, वे कहा जाते हैं?

एडमंड बर्क की जिज्ञासा एकदम प्रामाणिक थी। पादरी भी ठगा सा रह गया। अब क्या कहे? उसे बड़ी उलझन हो गयी। अगर वह कहे कि जो लोग पुण्यात्मा हैं और परमात्मा में भरोसा नहीं करते, वे भी स्वर्ग जाते हैं; तो स्वभावत: बर्क कहेगा, फिर परमात्मा में भरोसे की जरूरत क्या है? पुण्य ही काफी है। और अगर मैं कहूं कि जो लोग पुण्यात्मा हैं और परमात्मा में भरोसा नहीं करते, वे स्वर्ग नहीं जाते; तो बर्क कहेगा, तो फिर पुण्य की झंझट में पड़ने की क्या जरूरत? परमात्मा’ में भरोसा काफी है। पादरी ने कहा, मुझे तुमने उलझन में डाल दिया। थोड़ा मुझे सोचने का समय दो; कल।

रातभर पादरी सो न सका। आदमी निष्ठावान रहा होगा। चालाक नहीं, बुद्धिमान रहा होगा। बहुत सोचा, लेकिन उलझन न हल हुई। सुबह-सुबह, भोर होते-होते, रातभर का जागा सोचता-सोचता नींद लग गयी। नींद में उसने एक सपना देखा कि वह एक ट्रेन में बैठा है। उसने लोगों से पूछा, यह ट्रेन कहा जा रही है? उन्होंने कहा, यह स्वर्ग जा रही है। उसने कहा, चलो अच्छा हुआ! यही तो मुझे पूछना था। यह अच्छा ही हुआ, आख से ही देख लूंगा। तो उसने सोच रखे नाम मन में-जैसे सुकरात; परमात्मा में भरोसा नहीं करता था, आदमी पुण्यात्मा था। जैसे बुद्ध; इससे और पुण्य की ‘साकार प्रतिमा कहा पाओगे? लेकिन आदमी परमात्मा में भरोसा नहीं करता था। तो उसने कहा, ठीक है, अगर ये बुद्ध और ये सुकरात स्वर्ग में मिल गए तो उत्तर साफ हो जाता है, कि परमात्मा में भरोसे की जरूरत नहीं। अगर ये स्वर्ग में न मिले, तो भी उत्तर साफ हो जाता है कि पुण्य से कुछ भी न होगा, असली चीज परमात्मा में भरोसा है।

स्वर्ग के स्टेशन पर उतरा, बड़ी हैरानी हुई। स्टेशन बड़ा उदास था। जैसे कई जमानों की धूल जमी हो, किसी ने साफ न की हो। थोड़ा हैरान हुआ। जाकर गौर से देखा तख्ती पर, तो स्वर्ग ही लिखा है। गांव में प्रविष्ट हुआ, बड़ी बेरौनक थी बस्ती। कहीं फूल खिलते न मालूम पड़ते थे। और किसी घर से वीणा के स्वर न उठते थे। कहीं कोई नाचता न मिला। मिले भी ऐसे-धर्मगुरु, पादरी, मुनि ; मगर कोई रौनक न मिली। ऐसे जैसे मुर्दे चल रहे हों। कहीं कोई महोत्सव न मिला। जिंदगी ऐसी लगी जैसे एक बोझ हो वहा। उसने पूछा कई से कि सुकरात, गौतम बुद्ध? लोगों ने कहा, नाम सुने नहीं। यहां नहीं हैं। दूसरी जगह, नर्क में खोजो।

भागा स्टेशन आया। पूछा कि नर्क की गाड़ी? भाग्य से खड़ी थी, जा ही रही थी। वह बैठ गया। नर्क पहुंचा तो बड़ा हैरान होने लगा। जैसे किसी महोत्सव में प्रवेश हो रहा हो। बड़ा स्वच्छ था स्टेशन। जीवन मालूम पड़ता था। फूल खिले थे, गीत बजते थे, लोग चलते थे तो उनके पैरों में गति थी, रौनक थी, रंग-बिरंगापन था, जीवन का इंद्रधनुष जैसे खिला था। वह बड़ा हैरान हुआ कि यह तो कुछ गड़बड़ है। नाम में, तख्ती में कुछ भूल-चूक हो गयी। इसको स्वर्ग होना चाहिए। उसने पूछा कि सुकरात और बुद्ध? उन्होंने कहा कि ही, वे यहां हैं। और नाम में कोई गलती नहीं हुई है। उनके आने से ही यह नर्क स्वर्ग हो गया।

नींद खुल गयी उसकी। घबड़ाहट में नींद खुल गयी कि यह क्या-मामला है? सपना तो खो गया। जब वह सुबह चर्च गया, उसने कहा कि भई, मैं कुछ और न कह सकूंगा, लेकिन रात एक सपना आया है वह मैं दोहरा देता हूं उत्तर में। सपने में मुझे ऐसा दिखायी पड़ा; कहा तक सही है, कहा तक झूठ है, कुछ कह नहीं सकता। मेरी कोई सामर्थ्य भी नहीं इसका निर्णय लेने की। इतना मुझे दिखायी पड़ा और वह यह कि जहां भी पुण्यात्मा पुरुष पहुंच जाते हैं, वहीं स्वर्ग है। जहा पापी पहुंच जाते हैं, वही नर्क है। पापी नर्क जाते हैं, ऐसा नहीं। पापी अपना नर्क अपने साथ लेकर चलते हैं। और पुण्यात्मा स्वर्ग जाते हैं, ऐसा नहीं। पुण्यात्मा अपना स्वर्ग अपने साथ लेकर चलते हैं। तुम उन्हें कहीं भी फेंक दो।

और मुझे भी बात जंचती है। सपना नहीं, सच मालूम होती है। बुद्ध को तुम नर्क में भी डाल दो तो तुम नर्क में न डाल सकोगे। यह असंभावना है। बुद्ध वहा स्वर्ग खड़ा कर लेंगे। बुद्ध अपना स्वर्ग अपने साथ लेकर चलते हैं, वह बुद्ध के जीवन की हवा है। वह उनके आसपास चलता हुआ मौसम है। उसको तुम उनसे छीन न. सकोगे। नर्क बदल जाएगा, बुद्ध न बदलेंगे। तुम बुद्ध को दुखी नहीं कर सकते, तो तुम नर्क में कैसे डाल सकते हो? तुम तुम्हारे तथाकथित धर्मगुरुओं को सुखी नहीं कर सकते, तुम स्वर्ग कैसे भेज सकते हो?

बस इसी धुन में रहा मर के मिलेगी जन्नत,
तुझको ऐ शेख न जीने का करीना आया..

ओशो🌺🌺🌺

आत्मा मरती नही अमर है

🌹कृष्ण ने गीता में कहा है कि आत्मा मरती नहीं🌹

तो अर्जुन को कहा है कि तू मार बेफिक्री से, क्योंकि कोई आत्मा मरती नहीं। इसलिए अहिंसा का और हिंसा का कोई सवाल ही नहीं उठता। महावीर भी कहते हैं, आत्मा मरती नहीं; कोई मार सकता नहीं। पर महावीर हिंसा-अहिंसा का बड़ा सवाल उठाते हैं।

कृष्ण की दलील समझने जैसी है। कृष्ण कहते हैं, जब कोई मारा ही नहीं जा सकता, तो लोगों को यह समझाना कि मत मारो, मूढ़तापूर्ण है। जब मारने का कोई उपाय ही नहीं है, तो यह कहने का क्या अर्थ है कि मत मारो! और अगर कोई नहीं भी मार रहा है तो कौन-सा गुण उपलब्ध कर रहा है। क्योंकि मार सकता कहां है? जब हम एक आदमी को काटते हैं, तो शरीर ही कटता है। वह मरा ही हुआ है। उसको मारने का कोई उपाय नहीं है। आत्मा कटती नहीं।

कृष्ण कहते हैं: न हन्यमाने शरीरे—काटो कितना ही, तो भी कटती नहीं। छेदो तो छिदती नहीं। जलाओ तो जलती नहीं। तर्क कृष्ण का बहुत साफ है कि जब कोई मारने से मरता ही नहीं, मारा नहीं जाता, तो अर्जुन, तू फिजूल की बकवास में क्यों पड़ा है कि लोग मर जायेंगे? यह अज्ञान है।

बड़ा कठिन है। महावीर भी जानते हैं कि आत्मा मरती नहीं; आत्मा मिट नहीं सकती। सच तो यह है कि कृष्ण से भी ज्यादा महावीर का मानना है कि आत्मा को मिटाने का कोई उपाय नहीं है। क्योंकि कृष्ण तो कहते हैं, परमात्मा की लीला है कि वह बनाता है और चाहे तो मिटा सकता है। महावीर के लिए तो कोई मिटानेवाला भी नहीं है। परमात्मा भी नहीं है। आदमी की तो सामर्थ्य नहीं है।

आत्मा को न कोई पैदा करता है, और न कोई मिटा सकता है। आत्मा शाश्वत है; अमृतत्व उसका गुण है। फिर भी महावीर कहते हैं—हिंसा और अहिंसा। तो समझ लें इस संदर्भ में।

महावीर कहते हैं कि जब तुम हिंसा करते हो, तो तुम दूसरे को नहीं मारते, लेकिन हिंसा के भाव से खुद के लिए दुख पैदा करते हो। तुम मारने की धारणा बनाते हो, उस धारणा से ही तुम पीड़ित होते हो। दूसरे के मरने से पाप नहीं होगा। क्योंकि दूसरा मर नहीं सकता। लेकिन तुमने पाप करना चाहा। तुम पाप के विचार से भरे। तुमने दूसरे को नुकसान पहुंचाना चाहा; उसका जीवन छीन लेना चाहा। तुम नहीं छीन पाते। यह तुम्हारे हाथ की बात नहीं है। यह जगत का नियम है। लेकिन तुमने अपनी पूरी कोशिश की। उस कोशिश, उस विचार, उस भावना, उस वासना, उस दुष्ट वासना के कारण तुम अपने लिए दुख पैदा करोगे। हिंसा दुख लायेगी—दूसरे के लिए मृत्यु नहीं, तुम्हारे लिए दुख। अहिंसा दूसरे को बचायेगी नहीं, क्योंकि दूसरा बचा हुआ है अपने आंतरिक जीवन से। कोई उसे बचा नहीं सकता। लेकिन दूसरे को बचाने की धारणा तुम्हारे जीवन में सुख के फूल खिलायेगी।

महावीर कहते हैं, तुम जो भी करते हो, वह तुम्हीं को हो रहा है; और निरंतर तुम्हीं को होता चला जाता है। तो दूसरे कैसे हैं—अच्छे या बुरे—इसका विचार नहीं करना। अच्छे हैं तो अपने कारण; बुरे हैं तो अपने कारण। यह उनकी निजी बात है। इससे दूसरों को कोई लेना-देना नहीं है। वे नर्क जायेंगे कि स्वर्ग जायेंगे, यह उनकी चिंता है। इसमें दूसरों को चिंता लेने का कोई कारण नहीं है।

ओशो🌹🌹

मै बहुत दुखी हूं मुझे मार्ग दिखाये

🌹मैं बहुत दुखी हूं, मुझे मार्ग दिखाएं!🌹

दुखी कौन नहीं है? सभी दुखी हैं। और मार्ग भी एक है।
दुखी हो इसलिए कि जो है उससे भी राजी नहीं होते। क्या कारण है दुख का? इतना ही कारण है कि जो है उससे राजी नहीं होते; कुछ और होना चाहिए। जहां हो वहां राजी नहीं होते; कहीं और होना चाहिए। जैसे हो वैसे से राजी नहीं होते; कुछ और रूप होना चाहिए। सदा सपना देखते हो। सपने के कारण दुखी हो।
सपनों को जाने दो। जिस दिन सपने चले जाते हैं, उसी दिन सुख उतर आता है। सुख सपनों के अभाव में उतरता है। मांगो मत। कहो मत कि क्या होना चाहिए। जैसा है, जो है—इससे अन्यथा न हो सकता है, न होगा। इससे राजी हो जाओ। इसके साथ आनंदित हो जाओ—जैसा है। फिर कैसा दुख?
दुख तुम्हारी आकांक्षा के कारण है। दस हजार रुपये तुम्हारे पास हैं—क्या दुख है दस हजार रुपये में? दस हजार रुपये में दुख कैसे हो सकता है? होगा तो कुछ सुख ही होगा, दुख कैसे हो सकता है? लेकिन पड़ोसी के पास बीस हजार हैं, यह दुख है। तुम्हारे पास भी बीस हजार रुपये होने चाहिए, यह दुख है।
मैं एक घर में मेहमान होता था। बड़े धनपति थे। मुझे लेने एयरपोर्ट आए थे। उनकी पत्नी भी साथ थी। कुछ उदास से लगे। मुझे जब भी लेने आते थे तो कभी उदास उन्हें देखा नहीं था। कम से कम मैं जब तक रहता था उनके घर, तब तक वे प्रसन्न रहते थे। उस दिन उदास थे। मैंने पूछा: बात क्या है? उनकी पत्नी बोली। उनकी पत्नी ने कहा: अब आप न ही पूछें तो अच्छा है। इनके हिसाब से पांच लाख का नुकसान लग गया है। मैंने पूछा: इनके हिसाब से? उसने कहा: हां, इनके हिसाब से। मेरे हिसाब से पांच लाख का लाभ हुआ है। मैंने पूछा: मामला क्या है? पति बोले कि यह अपनी ही जिद्द हांके चली जाती है। इधर मुझे पांच लाख की हानि हो गई है, यह अपनी ही लगाए चली जाती है।
मैंने पूछा कि मुझे पूरी बात कहें। उन्होंने कहा कि बात यह है कि कोई धंधा किया था। दस लाख मिलने की आशा थी, पांच ही लाख मिले। दस लाख मिलने का पक्का ही था, आशा ही नहीं थी। मिलने ही चाहिए थे, और नहीं मिले। पांच ही लाख मिले।
अब कौन ठीक कह रहा है? दोनों ही ठीक कह रहे हैं। पांच लाख नहीं मिले तो दुख हो रहा है। पांच लाख मिले, उनका सुख भी गंवाया जा रहा है। जो नहीं मिले, उनके कारण जो मिले हैं, उनका सुख भी नहीं भोग पा रहे हो।
जीवन को देखने का ढंग बदलो। तुम्हारी व्याख्या में कहीं भूल है। कहीं तुम्हारी दृष्टि में भूल है। जो है वह बहुत है। अहोभाग्य! जितना है उसका रस लो। तो रूखी—सूखी रोटी भी परम भोग हो जाती है। और नहीं तो परम भोग भी पड़े रहते हैं सामने, तुम उदास बैठे देखते रहते हो; भूख ही नहीं लगती। भूख लगे तो कैसे लगे? तुम्हारी कल्पनाएं आकाश छूती रहती हैं। छूती हुई आकाश को जो कल्पनाएं हैं, उनके कारण तुम बिलकुल कीड़े—मकोड़े की तरह मालूम पड़ते हो, जमीन पर रेंगते हुए—उनकी तुलना में। यह तुलना की भ्रांति है।
सभी दुखी हैं, क्योंकि सभी वासनातुर हैं। तुम जहां हो, जैसे हो, जरा उसे तो देखो! वर्तमान के इस क्षण में कहां दुख है? या तो दुख अतीत से आता है। कल किसी ने गाली दी थी, अब तुम अभी तक दुखी हो रहे हो; न गाली रही, न गाली देने वाला रहा। गंगा में कितना पानी बह गया! अब तुम बैठे गाली लिए: कल एक आदमी गाली दे गया। अब तुम उसी की उधेड़बुन कर रहे। गाली को फिर—फिर सोच रहे। इधर से, उधर से सजा रहे, संवार रहे। घाव में और अंगुलियां चला रहे। घाव को भरने नहीं दे रहे। फिर—फिर बैठ जाते हो कि अरे! उसने गाली दी। लेटते, करवट लेते और गाली। ऐसा क्यों हुआ? क्यों उसने गाली दी? कैसे बदला लूं? क्या करूं? क्या न करूं?
या तो दुख अतीत से आता है, या भविष्य से। कल सुख मिलेगा या नहीं मिलेगा? कैसे आयोजन करूं? कल महल में कैसे मेरा प्रवेश हो? कल कैसे साम्राज्य मेरे हो जाएं? और डर लगता है कि हो नहीं पाएंगे। क्योंकि पहले भी तो तुम ऐसे ही सोचते रहे थे कई कल आए और गए और राजमहल तुम्हारे न हुए। तो अब भी क्या है कि कल हो जाएंगे राजमहल तुम्हारे? इतने कल आकर धोखा दे गए, यह कल भी उसी पंक्ति में जाएगा। तो घबड़ाहट लगती है। भय होता, दुख होता है। लेकिन कभी सोचा—इस क्षण में—जो न तो अतीत से आक्रांत है और न भविष्य से आंदोलित—कहीं दुख है? दुख पाया है कभी इस क्षण में?
तुम कहोगे: हां, कभी—कभी होता है। सिर में दर्द हो रहा हो, फिर? या पैर में कांटा गड़ा हो, फिर?
मैं तुमसे कहना चाहूंगा: जब सिर में दर्द हो रहा हो तब भी तुम शांति से बैठ जाओ, सिर के दर्द को स्वीकार कर लो। राजी हो जाओ। दर्द को अलग मत रखो। ऐसे दूर खड़े मत रहो कि मैं अलग, और यह रहा दर्द। दर्द है तो दर्द है। तो तुम दर्द हो। तो एक हो जाओ। डूब जाओ सिरदर्द में। स्वीकार कर लो। और तुम चकित हो जाओगे। तुम्हारे हाथ में एक कुंजी लगेगी उस दिन। तुम पाओगे: जितना तुम राजी हो जाते, उतना दर्द कम हो जाता। सिरदर्द नाराजगी है। सिरदर्द बेचैनी है, तनाव है। जैसे तुम राजी होने लगते…सिरदर्द से भी राजी हो गए, कि ठीक, चलो, दुआओं का असर है! परमात्मा ने भेजा, कुछ मतलब होगा। ऐसे अकारण तो भेज नहीं देगा। तुमको ही भेजा, इतना खयाल रखा। इतने सिर हैं—और दर्द तुमको भेजा! मतलब होगा। तुम पर विशेष कृपा है। दुआओं का असर है। स्वीकार कर लो, झुक जाओ।
और तुम चकित होओगे: जैसे—जैसे तुमने स्वीकार किया वैसे—वैसे दर्द कम हुआ। और अगर स्वीकृति परिपूर्ण हो जाए, सौ प्रतिशत, उसी क्षण दर्द खो जाएगा। तुम करके देखो! और उस दिन तुम पाओगे कि दुख को मिटाने की कला तुम्हारे हाथ में है।
जिंदगी राहे गम से निकल जाएगी,
तेरी दुनिया ही यक्सर बदल जाएगी।
उनके कदमों में इस बार सर तो झुका,
उनकी चश्मे करम फिर मचल जाएगी।
दिल को मिल जाएगा तेरे अमनो सकूं
वक्त रुक जाएगा जां सम्हल जाएगी।
तेरे सर पर है जो आज मुश्किल खड़ी।
तू यकीं रख कि कल तक वो टल जाएगी।
चांदनी में धुली रात भी आएगी।
धूप रंजो अलम की भी ढल जाएगी।
तेरी रग—रग में दौड़ेगी सच्ची खुशी।
झूठी ख्वाहिश इक दिन दिल की जल जाएगी।
जिंदगी राहे गम से निकल जाएगी।
तेरी दुनिया ही यक्सर बदल जाएगी।
बदल सकती है जिंदगी। जहां दुख है वहां सुख हो सकता है। दुख तुम्हारे कारण है। तुम्हारी गलत दृष्टि दुख की जन्मदात्री है। दृष्टि सृष्टि है। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि।
उनके कदमों में इक बार सर तो झुका!
स्वीकार करो! समर्पण करो! कहीं चरण खोज लो, जहां झुक सको। असली सवाल झुकना है, खयाल रखना। चरण कुशल उपाय है। कहां झुकते हो, कुछ मतलब नहीं है। झुको कहीं। बुद्धं शरणं गच्छामि!—चलेगा; कि महावीर के शरण में झुक जाओ, चलेगा; कि कृष्ण के पैर पकड़ लो, चलेगा। ये सब बहाने हैं। जिस दिन पहुंचोगे, उस दिन पाओगे: चरण सब उसी के हैं। किसी के भी चरण में झुक जाओ। चरण तो निमित्त हैं; झुकना असली बात है। इसलिए अगर वृक्ष के सामने भी झुक गए तो भी चलेगा।
वह जिसने पीपल को देवता मान लिया है और झुक जाता है, तो भी चल जाता है। जो जाकर गंगा में परम श्रद्धा से झुक जाता है, तो भी चल जाता है। असली सवाल न गंगा है, न पीपल का वृक्ष है, न पत्थर की मूर्ति है, न काबा है—असली बात है झुक जाना। स्वीकार कर लिया: ठीक है, जैसी प्रभु ने जीवन—यात्रा दी है, वैसी ही शुभ है।
उनके कदमों में इक बार सर तो झुका
उनकी चश्मे करम फिर मचल जाएगी।
तुम इधर झुके कि वहां परमात्मा की अनुकंपा बिखरी तुम पर। उनकी चश्मे करम फिर मचल जाएगी। तुम्हारे झुकते ही परमात्मा अपनी अनुकंपा को नहीं रोक कर रख सकता; वह मचल जाती है। इधर तुम झुके कि उधर परमात्मा तुम पर ढला। तुम अकड़े रहे तो परमात्मा कुछ भी नहीं कर सकता; उसकी अनुकंपा आती है और लौट—लौट जाती है। तुम उसे अंगीकार नहीं करते।
दिल को मिल जाएगा तेरे अमनो सकूं
वक्त रुक जाएगा जां सम्हल जाएगी।
एक बार झुको तो! वक्त रुक जाएगा। समय रुक जाएगा। न फिर कोई अतीत है, न फिर कोई भविष्य है। बस वर्तमान! बस वर्तमान! वर्तमान ही वर्तमान है!
वक्त रुक जाएगा जां सम्हल जाएगी
चांदनी में धुली रात भी आएगी।
धूप रंजो अलम की भी ढल जाएगी।
जिंदगी राहे गम से निकल जाएगी।
तेरी दुनिया ही यक्सर बदल जाएगी |

ओशो 🌹🌹