पश्चिम मुखी घर और मुख्य

।। ॐ वास्तु देवाय नमः ।।

।। पश्चिम मुखी घर और मुख्य द्वार: विस्तृत मार्गदर्शन ।।

क्या आपका घर पश्चिम मुखी है… और आपको डराया गया है कि यह अशुभ होता है? सच जानिए, सही दिशा में बना पश्चिम मुखी घर आपको स्थिर धन, सम्मान और सफलता दे सकता है।

अक्सर लोग बिना जाने पश्चिम मुखी घर को दोष देते हैं, जबकि असली कारण होता है गलत प्लानिंग।

पश्चिम दिशा का संबंध अस्त होते सूर्य से माना जाता है।

 वास्तु शास्त्र में इसे स्थिरता, परिश्रम के फल और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता है। 

प्रचलित भ्रम के विपरीत, पश्चिम मुखी घर अशुभ नहीं होते; सही योजना और संतुलन के साथ यह दिशा भी समृद्धि दे सकती है।

1. पश्चिम दिशा का महत्व

तत्व: जल और वायु के संतुलन से जुड़ी मानी जाती है।
देवता: वरुण देव का स्थान।

प्रभाव: मेहनत से अर्जित धन, स्थिर आय, और सामाजिक पहचान।

2. पश्चिम मुखी मुख्य द्वार के नियम

मुख्य द्वार की स्थिति
पश्चिम दिशा को 9 भागों में बाँटा जाता है।

पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार का निर्धारण वास्तु शास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। 

पश्चिम दिशा का संबंध मुख्य रूप से वरुण देव से माना जाता है, इसलिए द्वार का स्थान संतुलित और शुभ पद में होना चाहिए।

पश्चिम दिशा के पदों के नाम (उत्तर से दक्षिण की ओर)
पश्चिम दिशा को 9 पदों में विभाजित किया जाता है। ये पद इस प्रकार माने जाते हैं जैसे

1=पितृ

2=दौवारिक

3=सुग्रीव

4=पुष्पदंत

5=वरुण

6=असुर

7=शोष

8=रोग

9=पापयक्ष्मा

पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार कहाँ होना चाहिए?

पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार के लिए सर्वश्रेष्ठ पद माने जाते हैं जैसे
1=सुग्रीव पद

2=पुष्पदंत पद

3=वरुण पद

इन पदों में द्वार होने से घर में धन, सम्मान, अवसर और स्थिरता बढ़ती है। 

विशेष रूप से पुष्पदंत और वरुण पद अत्यंत शुभ माने जाते हैं।

पश्चिम दिशा में पितृ और दौवारिक पदों में मुख्य द्वार बनाने को लेकर मतभेद मिलते हैं। 
परंपरागत वास्तु ग्रंथों के अनुसार इनका फल इस प्रकार समझा जाता है।

1. पितृ पद
यह पश्चिम दिशा का उत्तरी भाग माना जाता है।

सामान्यतः इसे मध्यम फलदायी कहा गया है।

कुछ मतों में इसे स्थिरता देने वाला, परंतु अत्यधिक प्रगति न देने वाला स्थान माना गया है।

यदि घर के अन्य वास्तु तत्व संतुलित हों, तो यहाँ द्वार स्वीकार्य हो सकता है।

बेहतर परिणाम के लिए उत्तर-पश्चिम की ओर थोड़ा झुकाव शुभ माना जाता है।

2. दौवारिक पद

यह पितृ के दक्षिण में स्थित होता है।

इसे भी सामान्य या औसत फल देने वाला स्थान माना गया है।

अत्यधिक शुभ नहीं, पर पूर्णतः वर्जित भी नहीं।

व्यापारिक स्थल में कभी-कभी इसे स्वीकार किया जाता है, पर गृह उपयोग में सावधानी रखी जाती है।

स्पष्ट निष्कर्ष

सबसे श्रेष्ठ: सुग्रीव, पुष्पदंत, वरुण

मध्यम/स्वीकार्य (स्थिति अनुसार): पितृ, दौवारिक

त्याज्य: असुर, शोष, रोग, पापयक्ष्मा

यदि आपके प्लॉट की चौड़ाई या नक्शे की बाध्यता के कारण द्वार पितृ या दौवारिक में आ रहा है, तो सही आयाम, शुभ मुहूर्त, द्वार की ऊँचाई-चौड़ाई संतुलन, तथा अंदर की ऊर्जा व्यवस्था (रौशनी, स्वच्छता, खुलापन) से दोष कम किए जा सकते हैं।

किन पदों में मुख्य द्वार नहीं होना चाहिए?

निम्न पदों में मुख्य द्वार अशुभ माना जाता है।

1=असुर

2=शोष

3=रोग

4=पापयक्ष्मा

इन स्थानों पर द्वार होने से मानसिक तनाव, रोग, आर्थिक बाधाएँ और पारिवारिक असंतुलन की संभावना बढ़ती है।

।। अतिरिक्त महत्वपूर्ण बिंदु ।।

पश्चिम दिशा का द्वार हो तो घर का ढलान पूर्व या उत्तर की ओर होना शुभ रहता है।

द्वार के सामने अवरोध, खंभा या सीढ़ी सीधे नहीं होनी चाहिए।

द्वार मजबूत, स्वच्छ और रोशनी से युक्त होना चाहिए।

सही स्थिति (W3-W4): पश्चिम मुखी घर में मुख्य दरवाजा बिल्कुल बीच में या थोड़ा उत्तर-पश्चिम (North-West) की तरफ होना चाहिए, इसे W3 या W4 ज़ोन कहते हैं।

उत्तर-पश्चिम (पश्चिम का दाहिना भाग) में द्वार श्रेष्ठ माना जाता है।

ठीक मध्य पश्चिम भी स्वीकार्य है।

दक्षिण-पश्चिम भाग में मुख्य द्वार से बचना चाहिए।

।। द्वार से जुड़े विशेष उपाय ।।

दरवाज़ा अंदर की ओर खुलना चाहिए।

दहलीज अवश्य रखें।

स्वस्तिक, शुभ-लाभ या गणेश प्रतिमा द्वार के ऊपर लगाई जा सकती है।

पीले या हल्के भूरे रंग का प्रयोग शुभ रहता है।

3. कमरों की आदर्श दिशा

रसोई: दक्षिण-पूर्व सर्वोत्तम।

मास्टर बेडरूम: दक्षिण-पश्चिम।

पूजा कक्ष: उत्तर-पूर्व।

बैठक: पश्चिम या उत्तर दिशा।

सीढ़ियाँ: दक्षिण या पश्चिम भाग में।

4. पश्चिम मुखी घर के लाभ

मेहनती और कर्मशील व्यक्तियों के लिए अनुकूल।

राजनीति, प्रशासन या सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के लिए सहायक।

व्यापार में स्थिरता देता है।

5. संभावित दोष और उनके उपाय

यदि मुख्य द्वार दक्षिण-पश्चिम में हो

दरवाजे पर धातु की पिरामिड पट्टी लगाएं।

अंदर की दीवार पर वास्तु यंत्र स्थापित करें।

प्रवेश द्वार पर गहरे रंग से बचें।

यदि आर्थिक रुकावट हो
घर के उत्तर-पूर्व को हल्का और साफ रखें।

पश्चिम दिशा में भारी फर्नीचर रखें।

नियमित रूप से संध्या समय दीपक जलाएं।

यदि मानसिक तनाव बढ़े
पश्चिम दीवार पर प्रकृति या बहते जल का चित्र लगाएं।

नमक के पानी से साप्ताहिक पोंछा करें।

6. रंग और सजावट

पश्चिम दिशा के लिए क्रीम, हल्का पीला, हल्का नीला उपयुक्त।

भारी पर्दे पश्चिम दिशा में ठीक रहते हैं।

उत्तर-पूर्व को खुला और हल्का रखें।

7. प्लॉट और ढलान

पश्चिम मुखी प्लॉट में ढलान पूर्व या उत्तर की ओर होनी चाहिए।

पश्चिम भाग थोड़ा ऊँचा होना शुभ माना जाता है।।

।। निष्कर्ष ।।

पश्चिम मुखी घर किसी भी रूप में अशुभ नहीं है।

 वास्तविक प्रभाव घर की आंतरिक योजना, दिशा संतुलन और ऊर्जा प्रवाह पर निर्भर करता है। 

यदि निर्माण और सजावट सही नियमों के अनुसार हो, तो ऐसा घर स्थिर आय, सामाजिक सम्मान और दीर्घकालिक सफलता प्रदान कर सकता है।

बरगद का दूध बतासे में डालकर खाने वाला नुस्खा

बरगद का दूध बतासे में डालकर खाने वाला नुस्खा ऐसा है कि थोड़ा लिया तो फायदा करेगा, ज़रा ज़्यादा हुआ तो शरीर तुरंत नोटिस ले लेगा।
आयुर्वेद में इसे कमजोरी और थकान में उपयोगी माना जाता है, लेकिन ये चीज़ मिठाई नहीं है। एक छोटे बतासे पर बस 2–3 बूंद काफी होती हैं और वो भी हफ्ते में 1–2 बार।

बरगद के दूध यानी बरगद के पेड़ से निकलने वाले सफेद लेटेक्स को लेकर पारंपरिक घरेलू नुस्खों में यह कहा जाता है कि इसे बतासे के साथ एक-एक बूंद बढ़ाते हुए और फिर घटाते हुए 21 दिनों तक लेने से प्रमेह, स्वप्नदोष जैसी समस्याओं में लाभ मिलता है, वीर्य की गुणवत्ता सुधरती है और शुक्राणुओं की संख्या बढ़ती है। आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार बरगद का दूध संकोचक (astringent) और पुष्टिकारक माना जाता है, 
जो धातु को मजबूत करने और शरीर की कमजोरी दूर करने में सहायक बताया जाता है। हालांकि, यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि बरगद का लेटेक्स एक प्रकार का कच्चा पौधीय रस होता है, जो गलत मात्रा में लेने पर एलर्जी, पेट में जलन या अन्य दुष्प्रभाव भी कर सकता है। इन दावों पर आधुनिक वैज्ञानिक शोध बहुत सीमित हैं, इसलिए इस तरह का प्रयोग बिना योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक या डॉक्टर की सलाह के नहीं करना चाहिए।

जय गुरु गोरखनाथ

जय गुरु गोरखनाथ 🙏 अलख निरंजन!🙏🙏🙏

❓ नाथ परंपरा का अमोघ व्यापार वृद्धि मंत्र☘️

नाथ परंपरा – वो परंपरा जिसके सिद्ध योगियों ने अपनी तपस्या से ब्रह्मांड की शक्तियों को वश में किया। इसी महान परंपरा के शिरोमणि हैं महायोगी गुरु गोरखनाथ जी! आज हम आपके लिए लेकर आए हैं गुरु गोरखनाथ जी का एक ऐसा अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध शाबर मंत्र, जो आपके व्यापार में चमत्कारिक वृद्धि कर सकता है। यह कोई सामान्य मंत्र नहीं, बल्कि नाथ सम्प्रदाय का सिद्ध किया हुआ शाबर मंत्र है, जिसकी शक्ति अपार है। चाहे आपकी दुकान हो, शोरूम हो, ऑनलाइन बिजनेस हो या कोई भी व्यापार, यह मंत्र आपके धन-लाभ के सभी मार्ग खोल देगा।

🔍 शाबर मंत्र की महिमा

गुरु गोरखनाथ जी ने अपनी साधना से अनेक शाबर मंत्रों को सिद्ध किया। शाबर मंत्र की विशेषता यह है कि ये लोक भाषा में होते हैं, इनमें संस्कृत की जटिलता नहीं होती, लेकिन इनकी शक्ति किसी भी वैदिक मंत्र से कम नहीं होती। शाबर मंत्र सीधे सिद्ध योगियों की वाणी से निकले हुए मंत्र हैं, जो तुरंत प्रभाव दिखाने की क्षमता रखते हैं। व्यापार वृद्धि के लिए यह मंत्र इसलिए विशेष है क्योंकि इसमें गुरु गोरखनाथ जी की आज्ञा शक्ति, नवनाथों का आशीर्वाद और कुबेर देवता की कृपा – तीनों का संयोग है।

📜 व्यापार वृद्धि का सिद्ध शाबर मंत्र

मन्त्र ||
ओम विष्णु प्रिया लक्ष्मी, शिव प्रिया सती से प्रकट हुई।
कामाक्षा भगवती आदि शक्ति, युगल मुर्ति महिमा अपार,
दोंनो की प्रीती अमर, जानें संसार।
दुहाई कामाक्षा की। आय बढ़ा, व्वय घटा। दया कर माई।
ओम नमः विष्णु प्रियाय। ओम नमः शिव प्रियाय।
ओम नमः कामाक्षाय। ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं फट् स्वाहा॥

⚡ पूरी साधना विधि (21 दिवसीय प्रयोग)

शुभ मुहूर्त – गुरुवार या रविवार के दिन साधना शुरू करें। गुरु पुष्य नक्षत्र का योग मिल जाए तो अत्यंत शुभ।

साधना का समय – प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में (सुबह 4 से 6 बजे) या संध्या काल में सूर्यास्त के समय।

साधना स्थान – व्यापार स्थल पर या घर के पूजा स्थान पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।

आवश्यक सामग्री

➤ पीला कपड़ा, गुरु गोरखनाथ जी का चित्र या मूर्ति

➤ घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती

➤ एक लोटा जल, पीले फूल, अक्षत (चावल)

➤ केसर का तिलक, एक नारियल, गुड़ या मिश्री

➤ रुद्राक्ष की माला

साधना की विधि

➤ स्नान करके स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें।

➤ पूजा स्थान पर बैठकर गुरु गोरखनाथ जी का ध्यान करें, केसर का तिलक लगाएं, पीले फूल अर्पित करें।

➤ तीन बार "ॐ नमो आदेश गुरु गोरखनाथ को" बोलकर गुरु वंदना करें।

➤ रुद्राक्ष की माला पर इस मंत्र का जप प्रारंभ करें।

➤ प्रतिदिन 3 माला (324 बार) मंत्र का जप करें।

➤ लगातार 21 दिनों तक बिना नागा साधना करें।

➤ जप के बाद गुरु गोरखनाथ जी को गुड़ या मिश्री का भोग लगाएं।

➤ भोग प्रसाद स्वयं ग्रहण करें या किसी जरूरतमंद को दें।

➤ 21 दिन पूर्ण होने पर अंतिम दिन नारियल चढ़ाकर विशेष पूजा करें।

⚠️ महत्वपूर्ण नियम और सावधानियाँ

➤ साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।

➤ 21 दिन तक सात्विक भोजन करें। मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज वर्जित है।

➤ साधना काल में किसी से इस मंत्र के बारे में चर्चा न करें, मौन रहें।

➤ मंत्र जप के समय व्यापार वृद्धि का स्पष्ट चित्र मन में बनाएं, संकल्प शक्ति मजबूत रखें।

➤ साधना बीच में न छोड़ें। एक दिन भी छूटने पर पूरी साधना दोबारा शुरू करनी होगी।

✅ साधना के परिणाम

➤ व्यापार स्थल पर ग्राहकों की संख्या में वृद्धि

➤ अटके हुए सौदे बनने लगेंगे

➤ प्रतिस्पर्धियों से आगे निकलने की शक्ति

➤ धन का प्रवाह निरंतर बना रहेगा

➤ व्यापार की बाधाएं स्वतः दूर होंगी

➤ नए व्यापारिक अवसर सामने आएंगे

🔊 वैकल्पिक उपाय

अगर आप स्वयं मंत्र का जप नहीं कर सकते, तो इस मंत्र को प्रतिदिन अपने व्यापार स्थल पर सुन सकते हैं। सुनने से भी समस्त लाभों की प्राप्ति होगी।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1: क्या यह मंत्र हर तरह के व्यापार के लिए प्रभावी है?
उत्तर: हां, यह मंत्र हर प्रकार के व्यापार-व्यवसाय के लिए समान रूप से प्रभावी है। चाहे आप दुकान चलाते हों, शोरूम हो, ऑनलाइन बिजनेस करते हों, फैक्ट्री हो या ऑफिस – इस मंत्र की शक्ति सभी के लिए एक समान काम करती है।

प्रश्न 2: क्या महिलाएं यह साधना कर सकती हैं?
उत्तर: हां, सच्ची श्रद्धा और विश्वास रखने वाली कोई भी महिला इस साधना को कर सकती है। हां, मासिक धर्म के दौरान साधना न करें, उन दिनों में सिर्फ मंत्र का मानसिक जाप करें।

प्रश्न 3: क्या माला का होना अनिवार्य है?
उत्तर: माला से जप करने से मंत्र की ऊर्जा एकाग्र होती है और अधिक प्रभाव मिलता है। रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। अगर माला न हो तो अंगुलियों से गिनती करके भी जप कर सकते हैं।

प्रश्न 4: अगर एक दिन साधना छूट जाए तो क्या करें?
उत्तर: यदि एक दिन भी साधना छूट जाए तो पूरी 21 दिन की साधना दोबारा शुरू करनी होगी। इसलिए नियमितता बनाए रखना बहुत जरूरी है। साधना शुरू करने से पहले अपनी दिनचर्या देख लें।

प्रश्न 5: क्या सिर्फ मंत्र सुनने से भी लाभ होगा?
उत्तर: हां, यदि स्वयं जप करना संभव न हो तो नियमित रूप से इस मंत्र को सुनने से भी लाभ प्राप्त होता है। मंत्र की तरंगें वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाती हैं और व्यापार में वृद्धि होती है।

प्रश्न 6: क्या यह मंत्र कर्ज से मुक्ति दिला सकता है?
उत्तर: यह मंत्र सीधे व्यापार वृद्धि के लिए है। व्यापार बढ़ने से आय बढ़ेगी, जिससे कर्ज चुकाने की क्षमता बनेगी। नियमित साधना से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है और कर्ज का बोझ अपने आप कम होने लगता है।

प्रश्न 7: साधना के दौरान क्या खाने-पीने की कोई पाबंदी है?
उत्तर: हां, साधना काल में सात्विक भोजन करना चाहिए। मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज, तामसी भोजन से दूर रहें। हल्का और पौष्टिक भोजन लें। इससे मन शुद्ध रहता है और मंत्र का प्रभाव बढ़ता है।

प्रश्न 8: क्या यह मंत्र प्रतिस्पर्धियों को नुकसान पहुंचाने के लिए है?
उत्तर: बिल्कुल नहीं। यह मंत्र आपके अपने व्यापार की वृद्धि के लिए है, किसी को हानि पहुंचाने के लिए नहीं। किसी के प्रति द्वेष भाव रखकर यह साधना न करें। सकारात्मक संकल्प के साथ ही साधना करें।

प्रश्न 9: क्या इस मंत्र का जप किसी भी समय किया जा सकता है?
उत्तर: सबसे अच्छा समय ब्रह्ममुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) है। यदि यह संभव न हो तो संध्या काल में सूर्यास्त के समय भी कर सकते हैं। दिन के अन्य समय में भी कर सकते हैं, लेकिन प्रातः और संध्या का समय विशेष प्रभावी है।

प्रश्न 10: क्या यह साधना परिवार के दूसरे सदस्य भी कर सकते हैं?
उत्तर: हां, परिवार का कोई भी सदस्य इस साधना को कर सकता है। सभी मिलकर भी कर सकते हैं। इससे व्यापार में और अधिक वृद्धि होती है।

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आने वाली पुस्तक "सिद्ध शाबर मंत्र कोष" में गुरु गोरखनाथ सहित नाथ परंपरा के 101 सिद्ध शाबर मंत्रों का संग्रह होगा। साथ ही हर मंत्र की पूरी साधना विधि, नियम, सावधानियां और अनुभव साधकों के प्रत्यक्ष अनुभव भी इसमें शामिल किए जाएंगे। यह पुस्तक हर उस साधक के लिए अमूल्य है जो शाबर मंत्रों की सिद्धि प्राप्त करना चाहता है। जल्द ही यह पुस्तक आपके लिए उपलब्ध होगी।

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॥ गुरु गोरखनाथ जी की जय ॥
॥ अलख निरंजन ॥

बबूल की फली हड्डियों को बज्र बनाता है

बबूल की फली हड्डियों को बज्र बनाता है टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने के लिए गठिया (अर्थराइटिस )जोड़ों का दर्द सूजन बवासीर पाचनतंत्र कमजोरी और शुगर को भी कंट्रोल करने में बहुत अच्छा काम करता है लिकोरिया को 48 घंटे में कंट्रोल करें 
 माउथ#कैंसर में प्रयोग. बबूल का फल और नीम का फल 
 समान मात्रा में लेकर लौंग इलायची डालकर पानी में गर्म करके गलाला करना चाहिए मुंह में गिरा कर घाव को धोना चाहिए दिन में तीन-चार बार करना चाहिए 48 घंटे में आपको राहत पता चल जाएगा

 इसमें उत्तम कोटि का कैल्शियम पाया जाता है बबूल के फल के कई औषधीय फायदे हैं जो आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग किए जाते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख फायदे दिए गए हैं:

1. बवासीर (पाइल्स) में राहत*: बबूल के फल का उपयोग बवासीर के इलाज में किया जाता है। इसके फल का चूर्ण या काढ़ा बनाकर सेवन करने से बवासीर के लक्षणों में राहत मिलती है।

2. पाचन तंत्र की समस्याएं*: बबूल के फल में फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करता है। यह कब्ज, दस्त, और पेट दर्द जैसी समस्याओं में राहत प्रदान कर सकता है।

3. मधुमेह नियंत्रण*: बबूल के फल में #Roman्करा के स्तर को नियंत्रित करने वाले गुण होते हैं। इसका सेवन मधुमेह रोगियों के लिए लाभदायक हो सकता है।

4. त्वचा संबंधी समस्याएं*: बबूल के फल का उपयोग त्वचा संबंधी समस्याओं जैसे कि एक्जिमा, मुंहासे, और घावों के इलाज में किया जा सकता है। इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीबैक्टीरियल गुण त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।

5. मुंह के स्वास्थ्य में सुधार*: बबूल के फल का उपयोग मुंह के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है। इसके एंटीबैक्टीरियल गुण मुंह में बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकने में मदद करते हैं और दांतों और मसूड़ों को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं।

6. प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना*: बबूल के फल में विटामिन सी और अन्य एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं और शरीर को विभिन्न संक्रमणों से बचाते हैं।

7. महिलाओं के स्वास्थ्य में लाभ*: बबूल के फल का उपयोग महिलाओं में मासिक धर्म संबंधी समस्याओं और श्वेत प्रदर जैसी समस्याओं के इलाज में किया जा सकता है।

बबूल की फलियों का प्रयोग करते समय इनके बीज निकालने की आवश्यकता नहीं होती; पूरी फली को बीजों सहित ही सुखाकर चूर्ण बनाया जाता है।
​विभिन्न रोगों के लिए इसके सेवन की विधियाँ नीचे दी गई हैं:
​हड्डियों, जोड़ों और कमर दर्द: फली के बारीक चूर्ण को समान मात्रा में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम 1 चम्मच गुनगुने दूध के साथ लें। यह फ्रैक्चर जोड़ने और कैल्शियम की कमी दूर करने में रामबाण है।
​मुँह के रोग: फलियों को पानी में उबालकर उस काढ़े से कुल्ला (गरारे) करें।
​श्वेत प्रदर और स्वप्नदोष: फलियों के चूर्ण में पिसी हुई मिश्री मिलाकर ठंडे पानी या गाय के दूध के साथ नियमित सेवन करें।
​बवासीर और मधुमेह: बिना मिश्री मिलाया हुआ शुद्ध फली चूर्ण आधा चम्मच सुबह-शाम ताजे पानी के साथ लें।
​कैंसर: आयुर्वेद में इसे सहायक औषधि (Imunomodulator) के रूप में देखा जाता है, परंतु गंभीर रोगों में इसका प्रयोग केवल अनुभवी चिकित्सक की देखरेख में ही करें।

 सेवन करने की विधि. बबूल के फल को छाया में सुखाकर पाउडर  बनाकर भी सेवन कर सकते हैं 
 और ताजा का काढ़ा बनाकर भी सेवन कर सकते हैं
 लिकोरिया में ताजा फल को पीसकर मिश्री मिलाकर शर्बत बनाकर पीना चाहिए श्वेत प्रदर नष्ट हो जाता है
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किसी को पता नहीं सुख 7 नहीं 8 होते हैं

किसी को पता नहीं सुख 7 नहीं 8 होते हैं

1. पहला सुख निरोगी काया!
अर्थात हमारे शरीर में किसी भी प्रकार का कोई भी रोग नहीं होना चाहिए कोई बीमारी नहीं होनी चाहिए कोई कष्ट नहीं होना चाहिए किसी भी प्रकार की पीड़ा से मुक्त शरीर ही पहला सुख है।

2. दूसरा सुख घर में माया!
अर्थात जीवन जीने के लिए, दान पुण्य करने के लिए, और आनंद से जीवन व्यतीत करने के लिए हमारे घर में पर्याप्त माया हो।माया अर्थात धन होना चाहिए।

3. तीसरा सुख पुत्र आज्ञाकारी!
यदि किसी के पास अपार धन-दौलत हो रूप हो गुण हो ऐश्वर्या हो इज्जत हो लेकिन यदि उसका पुत्र उसकी ही आज्ञा नहीं मानता है तो वे तमाम सुख सुविधाएं उसके लिए नर्क के समान है पुत्र का आज्ञाकारी होना अति आवश्यक है।

4. चौथा सुख सुलक्षणा नारी!
सभी प्रकार के सुख सुविधाएं होते हुए रूप सौंदर्य होते हुए विभिन्न प्रकार के विलासिता के साधन होते हुए भी यदि पत्नी अच्छे लक्षणों वाली नहीं है तो जीवन में सुख नहीं हो सकता इसलिए एक पत्नी का सुलक्षणा होना अति आवश्यक है।

5. पांचवा सुख राज में पाया!
अर्थात यदि घर में मुख्य पुरुष के सरकारी नौकरी हो या वह राज्य कार्यों से जुड़ा हुआ हो राज्य से उसको आमदनी प्राप्त होती हो और राजकाज आसानी से हो जाते हो।

6. छठा सुख पड़ोसी "भाया"!
अर्थात हमारे पड़ोस में रहने वाले लोग इस प्रकार के होने चाहिए कि हमारे विचार उनसे मिलते हो और उनके विचार हमसे मिलते हैं वह हमारे साथ हमेशा अच्छा सोचते हो और हमारे सुख-दुख में सहयोगी होने चाहिए अन्यथा यदि सभी प्रकार की सुख सुविधाएं होने के बावजूद भी यदि पड़ोसी कुटिल है और हमारी हानि करने वाला है तो वह भी एक प्रकार का दुख है इसलिए पड़ोसी का अच्छा होना सुख माना गया है।

7. सातवा सुख मात पिता का साया!
जिस व्यक्ति के माता और पिता जीवित होते हैं वह व्यक्ति सभी सुखों को पा लेता है माता पिता की सेवा करने का अवसर प्राप्त होता है और माता-पिता का आशीर्वाद हमेशा बना रहता है तो माता-पिता का जीवित रहना भी एक प्रकार का सुख है।

8. आठवां सुख पुत्री का साया!
वैसे तो सुख सात ही प्रकार के माने गए हैं किंतु घर में पुत्री का होना आठवां सुख माना गया है इसलिए घर में 🌿यदि पुत्री हो और उपरोक्त सभी सुख उपलब्ध हो तो ये आठों सुख माने गए हैं।