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यदि हमारे परिवार में छोटी-छोटी बातों को लेकर खटपट रहती है
ज्ञान
ज्ञान के
बिना इस संसार में हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं, वह सब मोह माया है।
और ऐसे ही गलतफहरमी का शिकार होकर रिश्ते
बिगडते है।
ज़रा सी रंजिश पर ,ना छोड़ किसी अपने का दामन.
ज़िंदगी बीत जाती है
अपनो को अपना बनाने में|
विकास की भी यात्रा आसान नही होती
विकास की भी यात्रा आसान नही होती!कई मोड़ और पड़ाव आते हैं! कभी खुद को टूटते हुए देखते हैं!तो कोई एक उपलब्धि हमेशा के लिए भीतर के डर को जी लेती हैं!आत्म-विकास की राह भी पहाड़ चढ़ने जैसी ही हैं,जिस पर जीत सकुन दाता की कृपा महैर और दाता की दी हुई अच्छी मन और बुद्धि से बनाए!रास्ते पर चलकर ही मिलती है! लड़ाई झगड़े का परिणाम कभी भी फायदेमंद नहीं हुआ है!और नही होता हैं!यह बात सोच समझ कर विचार करने लायक है!सो हम जरूर विचार करें!करेगें तभी अमल में ला पायेंगे!मन को भी प्रेम से ही समझाया जा सकता है!हम जरूर विचार करें!
सत्तनाम!
राखी साध!
दुसरो पर हकुमत करने का भाव ही अंहकार की निशानी है
दूसरो पर हकुमत करने का भाव ही अंहकार की निशानी है!और अंहकारी कभी मुक्ती नही पाते! गुस्सा अंहकार से कोई कुछ भी नही पा सकते!मालिक दाता की शरण में आने वाले ही मुक्ती पाते हैं!मालिक दाता के यहाँ सबके लिए नियम एक है! कोई वक्से नही गये! अगर किसी ने गलती करके मान ली तो बच गये!और फिर अगर हमने नही मानी तो सजा पाई!हम कोशिश करें!हमसे कोई गलती हो गई!वो गलती दूवारा न हो
अच्छा हुआ या कम अच्छा हम कोशिश करें!जो हो वो हम सच बोले!क्योंकि जो सच होता हैं!वो मेरे दाता को सब पता होता हैं!इस लिए हमें क्यों छुपाना और क्यों कर्म के भागीदार बनें!
हम ज्यादा से ज्यादा दाता का नाम जपै!जिससे करनी रूपी धन जमा हो और ज्यादा से ज्यादा सच्चाई के साथ हर काम करें!ताकि अच्छे कर्म बनें!हमारे हम विचार जरूर करे!और करेंगें!तभी अमल कर पायेंगे!
सतनाम!
राखी साध!
चक्र और नींद
चक्र और नींद
जो व्यक्ति मूलाधार चक्र पर केंद्रित है उसकी नींद गहरी न होगी। उसकी नींद उथली होगी क्योंकि यह दैहिक तल पर जीता है। भौतिक स्तर पर जीता है। मैं इन चक्रों कि व्याख्या इस प्रकार भी कर सकता हूं।
प्रथम, भौतिक—मूलाधार।
दूसरा, प्राणाधार—स्वाधिष्ठान।
तीसरा, काम या विद्युत केंद्र—मणिपूर।
चौथा, नैतिक अथवा सौंदयपरक—अनाहत।
पांचवां, धार्मिक—विशुद्ध।
छठा, आध्यात्मिक—आज्ञा।
सातवां, दिव्य—सहस्त्रार।
जैसे-जैसे ऊपर जाओगे तुम्हारी नींद गहरी हो जाएगी। और इसका गुणवता बदल जायेगी। जो व्यक्ति भोजन ग्रसित है और केवल खाने के लिए जीता है। उसकी नींद बेचैन रहेगी। उसकी नींद शांत न होगी। उसमें संगीत न होगा। उसकी नींद एक दु:ख स्वप्न होगी। जिस व्यक्ति का रस भोजन में कम होगा और जो वस्तुओं की बजाएं व्यक्तियों में अधिक उत्सुक होगा, लोगों के साथ जुड़ना चाहता है। उसकी नींद गहरी होगी। लेकिन बहुत गहरी नहीं। निम्नतर क्षेत्र में कामुक व्यक्ति की नींद सर्वाधिक गहरी होगी। यही कारण है कि सेक्स का लगभग ट्रैक्युलाइजर, नशे की तरह उपयोग किया जाता है। यदि तुम सो नहीं पार रहे हो तो और तुम संभोग में उतरते हो तो शीध्र ही तुम्हें नींद आ जायेगी। संभोग तुम्हें तनाव मुक्त करता है। पश्चिम में चिकित्सक उन सबको सेक्स की सलाह देते है जिन्हें नींद नहीं आ रहा है। अब तो वे उन्हें भी सेक्स की सलाह देते है जिन्हें दिल का दौरा पड़ने का खतरा है। क्योंकि सेक्स तुम्हें विश्रांत करता है। तुम्हें गहरी नींद प्रदान करता है। निम्न तल पर सेक्स तुम्हें सर्वाधिक गहरी नींद देता है।
जब तुम और ऊपर की और जाते हो, चौथे अनाहत चक्र पर तो नींद अत्यंत निष्कंप, शांत, पावन व परिष्कृत हो जाती है। जब तुम किसी से प्रेम करते हो तो तुम अत्यंत अनूठी विश्रांति का अनुभव करते हो। मात्र विचार कि कोई तुम्हें प्रेम करता है। और तुम किसी से प्रेम करते हो। तुम्हें विश्रांत कर देता है। सब तनाव मिट जाते है। एक प्रेमी व्यक्ति गहरी निद्रा जानता है। धृणा करो तो तुम सो न पाओगे। क्रोध करो तो तुम सो न पाओगे। तुम नीचे गिर जाओगे। प्रेम करो, करूणा करो। और तुम गहरी नींद आएगी।
पांचवें चक्र के साथ नींद लगभग प्रार्थना पूर्ण बन जाती है। इसी लिए सब धर्म लगभग आग्रह करते है कि सोने से पहले तुम प्रार्थना करो। प्रार्थना को निद्रा के साथ जोड़ दो। प्रार्थना के बिना कभी मत सोओ। ताकि निद्रा में भी तुम्हें उसके संगीत का स्पंदन हो। प्रार्थना की प्रतिध्वनि तुम्हारी नींद को रूपांतरित कर देती है।
पांचवां चक्र प्रार्थना है—और यदि तुम प्रार्थना कर सकते हो तो और अगली सुबह तुम चकित होओगे। तुम उठोगे ही प्रार्थना करते हुए। तुम्हारा जागना ही एक तरह की प्रार्थना होगी। पांचवें चक्र में नींद प्रार्थना बन जाती है। यह साधारण नींद नहीं रहती।
तुम निद्रा में नहीं जा रहे। बल्कि एक सूक्ष्म रूप से परमात्मा में प्रवेश कर रहे हो। निद्रा एक द्वार है जहां तुम अपना अहंकार भूल जाते हो। और परमात्मा में खो जाना आसान होता है। जो कि जाग्रत अवस्था में नहीं हो पाता। क्योंकि जब तुम जागे हुए होते हो तो अहंकार बहुत शक्तिशाली होता है।
जब तुम गहरी निद्रावस्था में प्रवेश कर जाते हो तुम्हारी आरोग्यता प्रदान करने वाली शक्तियों की क्षमता सर्वाधिक होती है। इसीलिए चिकित्सक का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति बीमार है और सो नहीं पाता तो उसके ठीक होने की संभावना कम हो जाती है। क्योंकि आरोग्यता भीतर से आती है। आरोग्यता तब आती है। जब अहंकार का आस्तित्व बिलकुल नहीं बचता। जो व्यक्ति पांचवें चक्र—प्रार्थना के चक्र तक पहुंच गया है। उसका जीवन एक प्रसाद बन जाता है। जब वह चलता है तो उसकी भाव भंगिमाओं में आप एक विश्रांति का गुण पाओगे।
आज्ञा चक्र, अंतिम चक्र है जहां नींद श्रेष्ठतम हो जाती है। इसके पार नींद की आवश्यकता नहीं रहती, कार्य समाप्त हुआ। छटे चक्र तक निद्रा की आवश्यकता है। छठे चक्र में निद्रा ध्यान में रूपांतरित हो जाती है। प्रार्थना पूर्ण ही नहीं,ध्यानपूर्ण।
क्योंकि प्रार्थना में द्वैत है। मैं और तुम, भक्त और भगवान। छठवें में द्वैत समाप्त हो जाता है। निद्रा गहन हो जाती है। इतनी जितनी की मृत्यु। वास्तव में मृत्यु और कुछ नहीं बल्कि एक गहरी नींद है और कुछ नहीं बल्कि एक छोटी-सी मृत्यु है। छठे चक्र के साथ नींद अंतस की गहराई तक प्रवेश हो जाती है। और कार्य समाप्त हो जाता है।
जब तुम छठे से सातवें तक पहुंचते हो तो निद्रा की आवश्यकता नहीं रहती।
तुम द्वैत के पार चले गए हो। तब तुम कभी थकते ही नहीं। इसलिए निद्रा की आवश्यकता नहीं रहती है।
यह सातवीं अवस्था विशुद्ध जागरण की अवस्था है।
सतनामी पंथ के नियम
सत्तनामी पंथ के नियम!
१- ग्यान को प्राप्त करना निर्वान ग्यान रोज पढना सुनना समझना व भेदी होना है!भेदी होने से आत्मा को सुख प्राप्त होता है!मन का अँधेरा दूर होता है!और आत्मवल मे मजबूती आती है !
भय भर्म दूर हो जाते है!सुख शान्ति का मार्ग दिखता है!
साध बनते है!अनेक दुख बुराईयों से हम सब मनुष्य बनते है!बुध्दिमानी आती है!
एेसे ही अनेक लाभ प्राप्त होते है!
ग्यान प्राप्ति के लिए परमानी पहुँचे हुये संतन की कहन अर्थात निर्बान ग्यान नित्य पढ़े!याद कंठ करले!
इसके अर्थो की बूझ करें!हम समझे साध सै मेल करें!मिलकर हम बिचार करें!और सच्चाई ग्रहण करें!!
सत्तनाम सही !
क्रोध पर नियंत्रण
एक बार एक राजा घने जंगल में भटक जाता है जहाँ उसको बहुत ही प्यास लगती है। इधर उधर हर जगह तलाश करने पर भी उसे कहीं पानी नही मिलता, प्यास से उसका गला सुखा जा रहा था तभी उसकी नजर एक वृक्ष पर पड़ी जहाँ एक डाली से टप टप करती थोड़ी -थोड़ी पानी की बून्द गिर रही थी।
वह राजा उस वृक्ष के पास जाकर नीचे पड़े पत्तों का दोना बनाकर उन बूंदों से दोने को भरने लगा जैसे तैसे लगभग बहुत समय लगने पर वह दोना भर गया और राजा प्रसन्न होते हुए जैसे ही उस पानी को पीने के लिए दोने को मुँह के पास ऊचा करता है तब ही वहाँ सामने बैठा हुआ एक तोता टेटे की आवाज करता हुआ आया उस दोने को झपट्टा मार के वापस सामने की और बैठ गया उस दोने का पूरा पानी नीचे गिर गया।
राजा निराश हुआ कि बड़ी मुश्किल से पानी नसीब हुआ और वो भी इस पक्षी ने गिरा दिया लेकिन अब क्या हो सकता है। ऐसा सोचकर वह वापस उस खाली दोने को भरने लगता है। काफी मशक्कत के बाद वह दोना फिर भर गया और राजा पुनः हर्षचित्त होकर जैसे ही उस पानी को पीने दोने को उठाया तो वही सामने बैठा तोता टे टे करता हुआ आया और दोने को झपट्टा मार के गिरा के वापस सामने बैठ गया ।
अब राजा हताशा के वशीभूत हो क्रोधित हो उठा कि मुझे जोर से प्यास लगी है, मैं इतनी मेहनत से पानी इकट्ठा कर रहा हूँ और ये दुष्ट पक्षी मेरी सारी मेहनत को आकर गिरा देता है अब मैं इसे नही छोड़ूंगा अब ये जब वापस आएगा तो में इसे खत्म कर दूंगा। इस प्रकार वह राजा अपने हाथ में चाबुक लेकर वापस उस दोने को भरने लगता है।
काफी समय बाद उस दोने में पानी भर जाता है तब राजा पीने के लिए उस दोने को ऊँचा करता है और वह तोता पुनः टे टे करता हुआ जैसे ही उस दोने को झपट्टा मारने पास आता है वैसे ही राजा उस चाबुक को तोते के ऊपर दे मारता है और उस तोते के वहीं प्राण पखेरू उड़ जाते हैं।
तब राजा सोचता है कि इस तोते से तो पीछा छूंट गया लेकिन ऐसे बून्द-बून्द से कब वापस दोना भरूँगा और कब अपनी प्यास बुझा पाउँगा इसलिए जहाँ से ये पानी टपक रहा है वहीं जाकर झट से पानी भर लूँ ऐसा सोचकर वह राजा उस डाली के पास जाता है जहां से पानी टपक रहा था वहाँ जाकर जब राजा देखता है तो उसके पाँवो के नीचे की जमीन खिसक जाती है।
क्योकि उस डाली पर एक भयानक अजगर सोया हुआ था और उस अजगर के मुँह से लार टपक रही थी राजा जिसको पानी समझ रहा था वह अजगर की जहरीली लार थी।
राजा के मन में पश्चॉत्ताप का समन्दर उठने लगता है की हे प्रभु ! यह मैंने क्या कर दिया, जो पक्षी बार बार मुझे जहर पीने से बचा रहा था क्रोध के वशीभूत होकर मैने उसे ही मार दिया। काश मैने सन्तों के बताये उत्तम क्षमा मार्ग को धारण किया होता, अपने क्रोध पर नियंत्रण किया होता तो ये मेरे हितैषी निर्दोष पक्षी की जान नही जाती ।
हे भगवान मैने अज्ञानता में कितना बड़ा पाप कर दिया ? ? हाय ये मेरे द्वारा क्या हो गया ऐसे घोर पाश्चाताप से प्रेरित हो वह राजा दुखी हो उठता है। मित्रो इसीलिये कहा गया हैं कि क्षमा औऱ दया धारण करने वाला ही सच्चा वीर होता है क्रोध में व्यक्ति दुसरो के साथ-साथ अपने खुद का ही अधिक नुकसान कर देता है।
क्रोध वो जहर है जिसकी उत्पत्ति अज्ञानता से होती है और अंत पाश्चाताप से होता है। इसलिए हमें हमेशा अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिये ।
मौन साधना की महिमा
🌹मौन साधना की महिमा 🌹
तीन स्थान पर मौन रखना चाहिये स्नान, ध्यान, भोजन, मौन सरवोतर टानिक है।उर्दु में इसे खामोशी कहते है जो काम हम बोलकर नहीं कर पाते वह मौन कर देता है मौन से साधना में ही सिद्धि प्राप्त होती है। मौन बाणी का सयंम है। प्रानी के दो मित्र है मौन और एकांत बास मौंन से मन में ताजगी खोई हुई शक्ति मिलती है मौनी कभी भी दूसरों को तखलीफ नहीं पहुंच सकता बोलने से अनर्थ "महाभारत के समय अन्धे के अन्धे" मौन की गयीं साधना पूणँ बनती मौन से जीवन मे शान्ति मिलती है जहाँ मौन की पूणँता होती है वहाँ बिबेक कीप्रतिष्टा होती है जिसकी जीभ लम्बी उसका संसार लम्बा।जिसकी जीभ छोटी उसका संसार छोटा। मौन से स्वय पर नियन्त्रण आता है मौन से क्लेश सघषँ दूर होता है मौन जीवन का परम मित्र है और परम सहायक है। मौन साधना को तपों में श्रेष्ठ माना. गया है कहा जाता है पहले बोली चलती है फिर गोली चलती है।🌹🌹🌹🌹🌹Naresh, N,K,
एक आदमी रात को झोपड़ी में बैठकर एक छोटे से दीये को जलाकर कोई शास्त्र पढ़ रहा था
एक आदमी रात को झोपड़ी में बैठकर एक छोटे से दीये को जलाकर कोई शास्त्र पढ़ रहा था ।
आधी रात बीत गई
जब वह थक गया तो फूंक मार कर उसने दीया बुझा दिया ।
लेकिन वह यह देख कर हैरान हो गया कि जब तक दीया जल रहा था, पूर्णिमा का चांद बाहर खड़ा रहा ।
लेकिन जैसे ही दीया बुझ गया तो चांद की किरणें उस कमरे में फैल गई ।
वह आदमी बहुत हैरान हुआ यह देख कर कि एक छोटे से दीए ने इतने बड़े चांद को बाहर रोेक कर रक्खा ।
इसी तरह हमने भी अपने जीवन में अहंकार के बहुत छोटे-छोटे दीए जला रखे हैं जिसके कारण परमात्मा का चांद बाहर ही खड़ा रह जाता है ।
जबतक वाणी को विश्राम नहीं दोगे तबतक मन शांत नहीं होगा।
मन शांत होगा तभी ईश्वर की उपस्थिति
महसूस होगी ।....
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संत कह रहे हैं कि हे मूर्ख मन अहंम को त्यागकर
* गरब कौ छाँड़ दे दरब भी जायगा,
मूड़ मन मगज मैं कांई हारै*
संत कह रहे हैं कि, हे मूर्ख मन, अहंम को त्यागकर, मनुष्य जन्म के रहते, चेत जा।
अभी समय शेष है, समय के रहते चेत जा, अन्यथा मनुष्य जन्म व्यर्थ ही चला जायेगा।
संसार की मिटने छूटने बाली, उन वस्तुओं पर गरब करना, इतराना, उन्हें अपना मानना, जो कभी हमारी थीं ही नहीं, महामूर्खता है।
संसार की जितनी वस्तुयें हम देख रहे, या भोग रहे हैं, वह सभी हमें यहीं प्राप्त हुई हैं, और यहीं छूट जायेंगी।
हम जब इस नश्वर संसार से जायेंगे, तब एक सुई भी साथ नहीं ले जा सकेंगे।
पिछले जन्म में, प्रानी नें नाम ग्यान से लगे रहकर, जो अच्छे काम किये थे,
वही करनी हम साथ लेकर आये हैं।
उसी करनी से नाम ग्यान और मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है।
अब भी जब प्रानी इस संसार से जायेगा, तो करनी ही साथ लेकर जायेगा।
यह महल, दुमहले, यह अट्टालिकायें, और भोग विलाश, यहीं तक सीमित है, कुछ भी साथ जाने बाला नहीं।
यह मन को लुभाने, और भ्रमित करने बाला संसार, हमारी कर्म भूमि है, यहाँ रहकर हम अच्छे बुरे जो भी कर्म (करनी) करेंगे, वही प्रानी के साथ जायेंगे।
"चेत रे चेत, अचेत मूरख मना, भेद रे शब्द कौ भेद भाई"।
संत कह रहे हैं कि, हे अचेत मूर्ख मन, वख्त रहते सतगुर साहिब की सीख को समझकर अपने अन्तर मन में भिदा ले, अन्यथा समय निकल जायेगा।
"पंड कहैं कंगन बंधा, अभै भगत है जोग"।
पंडजी संत कह रहे हैं कि, अभी सब कुछ तुम्हारे हाँथ में है, अभी समय है, भक्ति कर सकते हो।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)।
चौकी किसी स्थान के लिए नही बल्कि चौकसी के लिए आया है
*चौकी रहियौ सावधान,
कोई मुसन न पाया*
निर्वान ग्यान में चौकी, किसी स्थान के लिये नहीं, बल्कि चौकसी के लिये आया है।
संत कह रहे हैं कि,
सावधानी पूर्वक, चौकसी करने बाले को, कभी भी कोई लूट नहीं सकता।
"पंड कहैं चौकस रखबाला, तौ खिड़ै नहीं तिल ऐती"।
जिस किसान ने, अपने खेत की चौकसी पूर्वक देखभाल की, उसी किसान का खेत पूरी तरह लहलहा उठा।
उसी के खेत में, कोई स्थान रिक्त नहीं रहा।
ठीक उसी प्रकार जिस साध नें अपना तन मन अर्पण करके, पूरे पूरे सतगुर साहिब के हुकमों को माना, उन्हीं सन्तों की एक भी सांस खाली नहीं गयी।
"भगत भेद पामैं परमानी"।
जिसने गुरू के पूरे हुकमों को माना, वही भगत भेद को पा सका,
यानी वही समझ सका कि, भक्ति कैसे की जाये।
"चौंकी मैं निगेवानी ऐसी, पलह नहीं बदलाना"।
ऐसी चौकसी कि, कोई भी पल बिना नाम के न गुजरे, हर आती जाती सांस पर बस एक ही नाम हो,
'सत्तअबगत', 'सत्तअबगत', 'सत्तअबगत'।
"पल पल मैं रहियौ सावधान, अबगत फुरमाया"।
हर पल, अहंकार की मार से बचकर, सुचेती और सावधानी पूर्वक, 'सत्त' को समझने, और प्रेम करने का,
सृष्टिकर्त्ता अबगत आप का फुरमान (हुकम), सतगुर साहिब नें संतों को दिया।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)।
गत होयगी सत्तनाम सै ,सतगुर तंत बताया
*गत होयगी सत्तनाम सै,
सतगुर तंत बताया*
सतगुर साहिब ने, भवसागर की धार में टिके रहने, और इसे पार करने के लिये, तंत वस्तु, 'सत्तनाम', यानी 'सत्तअबगत' नाम दिया है।
'सत्तअबगत' नाम एक पुकार है, जिसके द्वारा हम अपने मन की बात, अपने मन का दुख सुख, अपनी फरियाद सृष्टिकर्त्ता तक पहुँचा सकते हैं।
"दरगे अरज पहुँची जी आदू साधां री अरदास"।
आद के बन्दों की अरदास इतनी प्रबल थी कि, जब उनके जीवन में कठिन समय आया, तो अबगत आप को भी नहीं अच्छा लगा, और जो अबगत आप को अच्छा न लगे, वह तो कभी हो ही नहीं सकता।
"जब कलजुग नैं कहर कमाया, सो अबगत कौ नाय सुहाया"।
"जुग ऊपर हुकमी सतगुर आया, हेला दै दै साध जगाया"।
अबगत आप के हुकम से, उनके हुकमी सतगुर साहिब नें भवसागर में आकर, कठिन समय से गुजर रहे संतों की मदत की।
"सतगुर इसम बताइया, अगम अगोचर माहिं"।
इसम, (नाम), 'सत्तअबगत'।
अगम, जो हमेंशां था, और हमेंशां रहेगा।
अगोचर, जो संतों की द्रष्टि से ओझल यानी ओट हो गया था,
सतगुर साहिब नें भवसागर में आकर, उन्हें फिर से वही नाम दिया।
'सत्तअबगत' नाम एक पतवार है, यह जब तक हमारे पास है, हमारी नैया भवसागर में ढ़ूब नहीं सकती।
"नाम का फुरमान ऐसा, जासै औतरे औतार"।
यही वह नाम है, जिसे जपकर संतों ने भवसागर पार किया।
जब तक ये नाम प्रानी के पास है, प्रानी, मनुष्य जन्म पाता रहेगा।
जपौ प्रानी 'सत्तअबगत'।
अमृतबानी, 'सत्तअबगत'।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)।
सबसे बड़ी शक्ति तो वो है
सबसे बड़ी शक्ति तो वो है!जो है हमारे पास हम उसमें ही सवर और संतोष धीरज रख्खे!
अब तुम शायद यह कहोगे
कि यह सब कहने सुनने की बाते हैं! मैं तो यही कहना चाहूँगा!क्योंकि मैं हर हाल में संतुण्ट रहना चाहता हूँ!और हमेशा कोशिश करता हूँ!अब रही बात काम धन्धे और मनके विचार सुधार की अपनी कोशिश हमें पूरी करनी चाहिऐ काम धन्धे को अच्छे से अच्छा करने की उसके बाद भी काम में कोई सुधार नहीं आता हैं!तो हम मनमें यह विचार पैदा करें!दाता तुम अपने इस प्रानी को ऐसी शक्ति प्रदान करों हर उलझन और विपदा से ऊवार दो!
हम यह बात मनमें हृदय मे उतारने की कोशिश करते रहे!मालिक के नाम से बढ़कर कोई शक्ति नही हैं!
जो काम करने मे हम असफल हो रहें!उसमें भी कोई भेद होगा!हम घवराये नही वेचैन नही हो उठकर बैठे और बैठकर खड़े हो तो भी मेरे दाता का धनकारा इस मनमें हो!
यह बतकई नही है!यह अन्तर मन की कुछ बातें हैं!जो मुझे लग रही है!अगर यह बातें अमल में लाई गई तो जरूर हम हर मोड़ पर कामयाब होगे!मेरी कोई बात कम अच्छी लगे!तो मनसे मत लगाना उसे कोई अच्छा मोड़ ही देने की कोशिश करना ! ऐसी इस जगत में कोई शक्ति नही है!जो हमारे मनमे शान्ति और काम में बढोत्तरी पैदा करेः!अच्छी सोच विचार के साथ मालिक के नाम से ही इस प्राणी को शक्ति मिलेगीं!अगर यह शक्ति हमने जगत में किसी से लेने की भी कोशिश की तो हम बहुत बड़ी भूल करेगे!
सत्तनाम ।
जिसने सतगुर साहिब के बताये नियम कायदा कानून का अनुशरण किया ,वह भवसागर पार हो गये
*सरे रहै साँचे मते,
सो पहुँचे निजठौर*
सरा, - सतगुर साहिब द्वारा बताया, वह कायदा कानून, जिस पर चलना ही बंदगी है।
"अब सतगुर नैं सरा बताया, चूक पड़ी दोजक पहुचाया"।
जिसने सतगुर साहिब के बताये नियम कायदा कानून का अनुशरण किया, वह भवसागर पार हो गये।
"जिन सतगुर की सीख न मांनी, ते भरम पड़ा चौरासी खानी"।
जिसने सतगुर साहिब के बताये मार्ग की अवहेलना की वह भवसागर मे ढ़ूब गये।
सतगुर साहिब नें बताया कि, यह संसार सृष्टिकर्त्ता अबगत आप का है।
"साधौ करौ अबगत की आस, ऐसै कहैं उदादास"।
उदादास बाबा की सीख (हुकम) है कि, अबगत आप से ही आस करो।
"अबगत सा और दूजा न कोई"।
अबगत आप के समान दूसरा कोई नहीं है।
"किरतम को वे ध्यान धरत हैं, महामूढ़ अग्यान"।
संत कह रहे है कि,
जो कर्त्ता को भूलकर, किरतम की आस, बंदगी, या ध्यान करते हैं, वह महामूर्ख और अग्यानी है।
"अब अबगत का चाँहा गावौ, हुकमी बंदा फैल उठावौ"।
संत कह रहे है कि,
सतगुर साहिब के हुकम मानने बाले हुकमी साध का काम है कि, वह अपने अन्दर व्याप्त सारी बुराइयों को दूर करके, अबगत आप के चाँहे के अनुसार अपना जीवन यापन करे।
"यही मता है अबगत आप का, सतगुर सौंपा आय, चौकस दुरस सत्त ही सत्त, भगत तना और भाव"।
चौकसी, दुरुस्ती और सुचेती के साथ नाम जपना ही साध का काम है।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)।
संत कह रहे हैं कि जिसके जीवन का कोई लक्ष है
*ये लछ साध शब्द सै भेदी*
लछ,- यानी लक्षन।
लछ,- यानी लक्ष(निशाना)।
शब्द सै भेदी,- यानी सतगुर साहिब के हुकमों की जानकारी का होना।
संत कह रहे हैं कि, जिसके जीवन का कोई लक्ष है, जिसके पास लक्षन, यानी साधनायें हैं,
और जिसको सतगुर साहिब के हुकमों की पूरी जानकारी है, सही मायने में वही साध हैं।
'सत्तअबगत' नाम के लिय भी, निर्वान ग्यान में, शब्द ही आया है।
शब्द (नाम और ग्यान) से भेदी साध की पहचान है कि, उसके जीवन में कैसा भी कठिन दौर क्यों न हो, वह सदां शान्त रहकर, विवेक से काम लेगा।
संत, साध की पहचान बता रहे हैं,
"जाकै अन्दर हो, जाकै अन्दर भिदी है सुफेदी"।
जिसके अन्तर मन में, पूरी तरह से ग्यान का उजाला हो, असल में वही साध है।
"शील संतोष रहै सत्त सेती, त्यागी द्रष्टा कैदी"।
जिसके पास शील होंगी, उसी का जीवन व्यापना रहित, और शान्त होगा।
जो हर परिस्थिती में खुश रहकर मालिक को धनकारा देगा, उसी के पास संतोष होगा।
जो भी है, उसी में संतोष करना और शान्त रहना, साध की सबसे बड़ी साधना है।
जिसकी द्नष्टि, संसारी विषय वासना की कैद से आजाद होगी, उसी की सोंच और मन में, ग्यान की परख पहचान होगी, वही सही से भगत मार्ग पर चल पायेगा।
जो सतगुर साहिब के हुकमों पर पूरी ईमानदारी से चल रहा होगा, उसी के पास 'सत्तअबगत' नाम का ठहराव होगा।
अर्थात, वही निर्बिघ्न, और निर्बाध, 'सत्तअबगत' नाम जप सकेगा।
"सतगुर का कहा अमल मन माना, तौ दरसी लुग लाहेदी"।
जिसने सतगुर साहिब के हुकमों पर पूरी तरह से, मन लगाकर अमल किया, वही लाभान्बित हुये।
उन्होंने ही पूरे लाभ यानी मोक्ष प्राप्त की।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)।