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एक गरीब आदमी ने भगवान से पूछा

एक गरीब आदमी ने भगवान  से पूछा : “मैं इतना गरीब क्यों हूँ?”,
भगवान  ने कहा :” *तुम गरीब हो क्योंकि तुमने देना नहीं सीखा* ” !
गरीब आदमी ने कहा :
“परन्तु मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं है”।भगवान  ने कहा :
“तुम्हारा चेहरा: एक *मुस्कान दे सकता* है. तुम्हारा *मुँह: किसी की प्रशंसा कर सकता* है या दूसरों को *सुकून* पहुंचाने के लिए *दो मीठे बोल बोल सकता है* , तुम्हारे *हाथ* : किसी *ज़रूरतमंद की सहायता कर सकते हैं* . . .और तुम कहते हो तुम्हारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं ? !!
*पाने का हक उसी को है . .
जो देना जानता है* …

दुःख ने हमे नहीं, हमने दुःख को पकड़ रखा है

अहंकार ने आपको नहीं
पकडा हुआ है, आपने अहंकार
को पकड़ा हुआ है। संसार ने आपको
नहीं पकड़ा हुआ है, आपने संसार को पकड़ा
हुआ है। दुख नहीं आपको जकड़े हैं, आपकी ही
कृपा का फल है। दुख आपका पीछा नहीं कर रहे हैं,
दुखों ने कुछ ठान नहीं रखी है आपको दुख देने की,
आपके निमंत्रण पर ही आते हैं।

साधारणत: हम ऐसा सोचते नहीं।
साधारणत: हम सोचते हैं, क्यों है दुख?
क्यों है यह संसार का कष्ट? क्यों है यह आवागमन?
क्यों यह अहंकार सताता है? कैसे इससे छुटकारा हो? निरंतर हमारे मन में यह बात चलती है, कैसे इससे छुटकारा हो?

लेकिन यह सूत्र आपको
बड़ा निराश करेगा। क्योंकि यह
सूत्र कहता है, छुटकारे का सवाल ही
नहीं है। क्योंकि अहंकार ने आपको पकडा
नहीं है, संसार ने आपको रोका नहीं है, जन्मों ने
आपको बुलाया नहीं है, यह आपकी मर्जी है।

इसलिए यह पूछना गलत
है कि कैसे छुटकारा हो, यही
पूछना उचित है कि किस भाँति,
किस तरकीब से हमने इस सब दुख,
उपद्रव को पकड़ रखा है। छुटकारे का
सवाल ही नहीं उठाना चाहिए। सवाल यही
होना चाहिए कि कौन सी है हमारी व्यवस्था, कौन
सा है हमारा ढंग, कि हम दुख को पकड़ लेते हैं, कि हम दुख को पकड़ते ही चले जाते हैं, कि अपने ही हाथ से हम आरोपित करते चले जाते हैं - और नए संसार, और नए जन्म, और नए जीवन। वासना के नए - नए विस्तार,
नए आकाश हम कैसे निर्मित करते चले जाते हैं -
इसे ही समझना जरूरी है।

इसके बहुत अंतर्निहित अर्थ होंगे।
इसका एक अर्थ तो यह होगा कि मोक्ष
कोई ऐसी उपलब्धि नहीं है जो पाने को है।
संसार जरूर खोने को है, लेकिन मोक्ष पाने को नहीं है। अगर आप संसार को छोड़ने में राजी हो जाएं,
तो मोक्ष पाया ही हुआ है। इसका यह अर्थ
हुआ कि मुक्त तो आप हैं ही, बड़ी
तरकीब से आप बंधन में पड़े है।

ओशो 🌹🌹

हम एक सोचने की मशीन है जो कि मालिक ने ही बनायी है

 हम एक सोचने की मशीन है जो कि मालिक ने ही बनायी है ।सोच से बिचार पैदा होते है बिचार बनते है हमारे करम से बिचार आते है जाते है बिचारो की श्रृंखला समाप्त नही होती बिचार negative आते है Postive भी आते है दया मयी भी आते है करुण मयी भी आते है क्रोध और इर्ष्या के भी आते है उन बिचारो से हमारा जुड़ाव यदि हो जाता है तो हमारे भाव भी बैसे बनने शुरू हो जाते है यह हमारा बिबेक है कि हम किन बिचारो के साथ जुड़ते है और किन बिचारो को पकड़ते है ब छोड़ देते है ।

Example किसी खेत मे बीज डालना यह हमारा भाव हुआ हमने बीज डाला सफ़ाई की पानी दिया बह हमारा करम हुआ जब उस पौधे से पैदावार का स्रोत शुरू हुआ बह हमारे बिचार या सोच हुयी ।

भाव मे परिवर्तन होता है संग से इसलिए सत्संग ब
साघ संगत बहुत ज़रूरी बताई है संतो ने .... यदि यह तक कह दिया ....सत्त रा शब्द पाया सगंत माहि
और गत्त है साध सगंत सै ।
साध संगत ऐसी सुखदायी ।
जाकै मिलै कुमत मिट जाईं ।।

हमारे भाव मालिक से मिलने के है और हमने उपाय किया मालिकलदाता के हुक्म को उठाया तो मालिक हमारी सोंच /बिचारो का परिवर्तन कर देते है और मालिक से जुड़ जाने पर बह हमे अपनी समर्पित होने ब दासता से ओतप्रोत बिचार देने लगते है ।
मालिक शबद स्वरूपी है बह शब्द ब शब्द का ज्ञान देते है और अपनी बनायी हुयी आत्मा को आनन्दमय
कर देते है ब निज ठौर मे बास देते है



 जो व्यक्ति किसी दूसरे के
 चेहरे पर हँसी और जीवन में ख़ुशी
 लाने की क्षमता रखता है ..

मालिक दाता उसके चेहरे से कभी हँसी और जीवन से ख़ुशी कम नहीं होने देता।

       

जब मौन शांत और ध्यान में आती जाती श्वास की पहचान हो



जब मौन शांत और ध्यान में आती जाती श्वास की पहचान हो और पता चले,अब आइ, ठहरी, अब गई, तब इस श्वास में क्या मिश्रित है, भगत या जगत, इसका अहसास और अनुभव होना बहुत ज़रूरी है

हर श्वास पर नाम तो तभी जपा जा सकता है ना जब आती जाती श्वास और उसकी गति की पहचान हो
संतों ने बार बार जुगत का वर्णन किया है

श्वास श्वास की फेरो माला
अगर श्वास तेज़ी से व्यय कर ली तो लेखा किसका देंगे?

पल पल में रहियो सावधान

पल तो श्वास से भी छोटा होता है और उसकी सजगता का हुक्म है तो फिर श्वास तेज़ व्यय होकर अंत तेज़ी से निकट आ रहा है इसकी जानसकारी अत्यंत ज़रूरी नहीं है? इसकी जुगत कि हर श्वास पर नाम का स्मरण मिश्रित हो अत्यंत ज़रूरी है

तेज़ी ना आकर मन में निर्मलता, ग़रीबत,प्रेम,सदाचार का आविर्भाव हो
श्वास धीमी चले बिना किसी टार्गट के क्यूँकि 21600 दम यह तो हमें स्वभाव में मिला है, हम ही मूरख हैं जो व्यथा श्वास खो रहे हैं
श्वास पूँजी है और इसका सही व्यय भगत मार्ग में अत्यंत ज़रूरी है क्यूँकि यही इस प्राणी को मालिक से मिलाने का एकमात्र ज़रिया है

श्वास अत्यधिक धीमे लेना या चढ़ा लेना भी चोरी है
तू तो कुबधी चोर सदा का
ज्ञान में किसके लिए कहा है और क्यूँ यह हम सब जानते हैं

विचार करें

भाई ,श्वास कम निकल रही हैं या तीव्र व्यय हो रही हैं इस बात की सजगता भी नहीं आइ तो कैसे जानेंगे कि श्वास भगत की तरफ़ की निकल रही है या जगत की?
स्वाँसा राखै नाम संग  सुरती रहै समाय
यही मुकत का धाम है  सतगुर दई बताए..


स्वाँस तो हर क्षण मालिक दे रहे है सुरत आपके हुक्म पर टकटकी लगाए रहे कि हर पल हम हुक्मी रहेंगे और यह हुक्म मालिक हम मान पाए ... माने हर समय हुक्मी हो कर रहने की सीख पर चलते रहे
तो हमारी सुरत हुक्मी के हुक्म पर रहेगी जिससे आठौ पहर की बन्दगी सहजता मे हो सकती है ।

ससार में सभी मनुष्य मौजूदा स्थिति में गुण एवं अवगुण दोनों से भरे हुए हैं

ससार में सभी मनुष्य मौजूदा स्थिति में गुण एवं अवगुण दोनों से भरे हुए हैं।न तो कोई ऐसा व्यक्ति है जिसके अंदर सारे गुण भरे हैं अवगुण नहीँ, न ऐसा कोई व्यक्ति है जिसके अंदर केवल अवगुण हों और कोई गुण न हो।अगर सारे गुण हों तो फिर परमहंस बनकर मालिक के पास ही पहुंच जायेगा, सारे अवगुण हों तो जीव बनकर पशु पक्षी की योनि में पहुँच जायेगा।पशु पक्षी के भी अपने गुण अवगुण होते हैं,जो कि हर पशु पक्षी में अलग अलग हैं।

 जब हमारे अंदर गुण अवगुण दोनों ही हैं, तो हमें करना क्या है?हमें अपने विचारों को तराशना है हीरे की भांति जैसे हीरा तराशने के बाद ही मूल्यवान बनता है ऐसे ही हम अपने गुणों को अपने विचार का अंग बनाएं अवगुण तराश कर विचारों से अलग करते जायें।लेकिन यह काम बिना प्रशिक्षण के नहीँ कर सकते, साध संगत नित्य करने से जिस मनुष्य के अंदर सिख भाव होता है,स्वतः प्रशिक्षित होता जाता है।अगर साध संगत में हम प्रोफेसर बनकर नित्य जाते भी हैं तो कुछ नया सीखना मुश्किल हो जाता है।

जब तक गुण अवगुण गड्डमड्ड हैं हमारी कोई कीमत नहीँ।जैसे दो अच्छी और बुरी चीजें मिक्स हो जाएँ उसमें चाहे अच्छी चीज की मात्रा ज्यादा भी हो ,तो भी उसका जो स्वरूप होगा उसे बुरा ही कहा जाता है।यही स्थिति हमारी भी है।हमें अपने ख़राब विचारों को पहिचान कर उनको कूड़ा मानकर नित्यप्रति अन्तःकरण से बाहर फेंकना है, शुध्द विचारों को सहेजना है।यह एक दिन का काम नहीँ प्रतिपल चेतन अवस्था में रहकर करना है।

काम बहुत बाकी है, समय थोड़ा है,अब एक भी पल व्यर्थ न जाए इसका प्रयास और मालिक से प्रार्थना अबिलम्ब शुरू कर दें।अन्यथा इस जीवन को भी व्यर्थ में गवांने के हम और केवल हम ही जिम्मेदार होंगे।फिर मौका मिला या न मिला चौरासी लाख योनियों में अपने विचारों की योग्यता अनुसार भटक रहे होंगे, जिसे सोंचकर भी रूह काँप जायेगी।फैसला हमें ही करना है, फैसले में देरी का कारण हमारा ग़ाफ़िल पन है, ग़ाफ़िल की मार निश्चित है, सचेत रहना ही होगा देरी सिर्फ मेरी तरफ से है।
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बुरे कर्म है लोहे की ज़ंजीर और अच्छे कर्म है सोने की ज़ंजीर

बुरे कर्म है लोहे की ज़ंजीर और अच्छे कर्म है सोने की ज़ंजीर
सही बात है क्यूँकि दोनो कर्म किसी ना किसी स्वार्थवश किए जाते हैं बुरे कर्म सांसारिक फल प्राप्त करने के लिए और अच्छे कर्म उन बुरे कर्मों के दण्ड घटाने और आध्यात्मिक फ़ायदे के मोह के लिए
असल में कर्म ज़ंजीर हैं चाहे सोने की या लोहे की क्यूँकि जब तक कर्म यह समझ कर किए जाते है कि इससे हमें कोई ना कोई लाभ की प्राप्ति करनी है तो पक्का है वो हमारे साथ लग जाते है या यूँ कहें उनके फल हमारे साथ हो जाते है और जब तक उनका निपटारा या न्याय नहीं हो जाता वह हमारे साथ लगे रहते हैं
अकर्म का भाव है जब कर्म तो हो या किया जाए पर उसमें से करता भाव विलुप्त हो जाए यानी यह प्राणी सिर्फ़ ज़रिया मात्र है मालिक के न्याय का और इसे उस कर्म से किसी भी तरह के फल की अभिलाषा नहीं है
हर भाव, विचार, बोल और कर्म के फल हैं और वह फल हमें ज़रूर मिलते हैं पर जब हम समर्पण करके यह बात जान लें कि जो भी हो रहा है वह पहले से निर्धारित है इसलिए अगर हमारे भाव समर्पणमई हैं तो कर्मों से ऊपर उठकर हम सब ज़ंजीरों से बच पाएँ

कर्मों की काई मिट जाई
जब ही सतगुर सहज लखाइ


ध्यान में अपने अंदर में उतरने से हमें कर्मों से दूर हटकर अकर्म और स्वीकार्यता को जानने का अवसर प्राप्त हो सकता है जिससे हमें समझ आ जाए कि सारे कर्म कांड हमें मालिक से नहीं मिला सकते बल्कि स्वीकार्यता हमें मालिक के चरणों में पहुँचा सकती है

विचार करें

पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा रही थी

पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा
रही थी और पति बार बार उसको अपनी हद में
रहने की कह रहा था
लेकिन पत्नी चुप होने का नाम ही नही ले
रही थी व् जोर जोर से चीख चीखकर कह रही
थी कि
"उसने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी और तुम्हारे
और मेरे अलावा इस कमरें मे कोई नही आया
अंगूठी हो ना हो मां जी ने ही उठाई है।।
बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो
उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा दे
मारा
अभी तीन महीने पहले ही तो शादी हुई थी ।
पत्नी से तमाचा सहन नही हुआ
वह घर छोड़कर जाने लगी और जाते जाते पति
से एक सवाल पूछा कि तुमको अपनी मां पर
इतना विश्वास क्यूं है..??
तब पति ने जो जवाब दिया उस जवाब को
सुनकर दरवाजे के पीछे खड़ी मां ने सुना तो
उसका मन भर आया पति ने पत्नी को बताया
कि
"जब वह छोटा था तब उसके पिताजी गुजर गए
मां मोहल्ले के घरों मे झाडू पोछा लगाकर जो
कमा पाती थी उससे एक वक्त का खाना
आता था
मां एक थाली में मुझे परोसा देती थी और
खाली डिब्बे को ढककर रख देती थी और
कहती थी मेरी रोटियां इस डिब्बे में है
बेटा तू खा ले
मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था
कि मां मेरा पेट भर गया है मुझे और नही
खाना है
मां ने मुझे मेरी झूठी आधी रोटी खाकर मुझे
पाला पोसा और बड़ा किया है
आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूं
लेकिन यह कैसे भूल सकता हूं कि मां ने उम्र के
उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है,
वह मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी
की भूखी होगी ....
यह मैं सोच भी नही सकता
तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो
मैंने तो मां की तपस्या को पिछले पच्चीस
वर्षों से देखा है...
यह सुनकर मां की आंखों से छलक उठे वह समझ
नही पा रही थी कि बेटा उसकी आधी
रोटी का कर्ज चुका रहा है या वह बेटे की
आधी रोटी का कर्ज...

दुख है मांग और चाह का होना सुख है अचाह होना

दुख और सुख

दुख है मांग और चाह का होना
सुख है अचाह होना

दुख है अभाव की ओर ध्यान देना और यही सोचना कि मेरे पास क्या नहीं है जो दूसरों के पास है
सुख है भाव की ओर ध्यान देना और यही सोंचना कि मेरे पास क्या है और मैं उसमें कितना त्रप्त हूँ

दुख है कमी ढूँढना
सुख है स्वीकार्यता

दुख है ईर्ष्या और मान की चाहना
सुख है सुमलत, कि जो मिला है वह बहुत है

दुख है शिकायत
सुख है धन्यवाद

दुख है लालसा
सुख है संतोष

दुख है लोभ
सुख है दान

दुख है पराए की चाह
सुख है शील

दुख है बेचैनी
सुख है शांती

दुख है बेईमानी
सुख है ईमानदारी

दुख है अहंकार
सुख है समर्पण

दुख है 'मैं'
सुख है 'वो'

दुख है क्रोध
सुख है करुणा

दुख है बदला
सुख है क्षमा

दुख है अपने नाम की आस
सुख है सत्तनाम की आस

दुख है व्यभिचार
सुख है सदाचार

दुख है विस्मरण (बिसरना)
सुख है स्मरण (सुमरन)

दुख है कि मुझे मिल जाए सब
सुख है तेरा तुझको सौंप दिया सब

दुख है पकडना
सुख है छोड देना

दुख है सिर्फ अपने लिए मांगना
सुख है सिर्फ सबके लिए मांगना

'मेरा' का भाव दुख है,
एक सराय (शरीर) में रात (जीवन) व्यतीत करने पर उस सराय को अपना मान लेना और सदा उसमें रहने की चाहना दुख है
उसी सराय को समय पर छोडने के लिए तत्पर रहने का भाव सुख है

मालिक सबको भलो करियौ

गंगा में डुबकी लगाकर,तीर्थ किए हज़ार। इनसे क्या होगा,अगर बदले नहीँ विचार।



👉💎 गंगा में डुबकी लगाकर,तीर्थ किए हज़ार।
इनसे क्या होगा,अगर बदले नहीँ विचार।


👉💎 "इस दुनियाँ के हर शख्स को नफरत है "झूठ" से...

मैं परेशान हूँ ये सोचकर, कि फिर ये "झूठ" बोलता कौन है"।


👉💎 "निंदा "तो उसी की होती है
जो"जिंदा" है।
मरे हुए कि तो बस तारीफ ही होती हैं।


👉💎 महसूस जब हुआ कि सारा शहर,
मुझसे जलने लगा है,
तब समझ आ गया कि अपना नाम भी,
चलने लगा है”…


👉💎 सदा उनके कर्जदार रहिये जो आपके लिए कभी खुद का वक्त नहीं देखता है,
और
सदा उनसे वफ़ादार रहिये जो व्यस्त होने के बावजूद भी आपके लिए वक़्त निकालता है।


👉💎 मोक्ष  का  एक  ही  मार्ग  है।
         और  वह  बिल्कुल  सीधा  ही  है।
            अब  मुशकिल   उन्हें  होती  है।
       जिनकी  चाल  ही  टेड़ी  है।


👉💎 हम जब दिन की शुरुआत करते है,
तब लगता है की, पैसा ही जीवन है ..
 लेकिन, जब शाम को लौट कर घर आते है,
तब लगता है, शान्ति ही जीवन है ।


👉💎 फलदार पेड़ और गुणवान व्यक्ति ही झुकते है ,
सुखा पेड़ और मुर्ख व्यक्ति कभी नहीं झुकते ।
कदर किरदार की होती है… वरना…
कद में तो साया भी इंसान से बड़ा होता है.......


👉💎 पानी मर्यादा तोड़े तो  "विनाश"
                          "और"
         वाणी मर्यादा तोड़े तो "सर्वनाश"

इसलिए हमेशा अपनी वाणी पर संयम रखो

जीवन में सारा कुछ, हमारी सोंच पर आधारित है

जीवन में सारा कुछ, हमारी सोंच पर आधारित है।
 हमारी अच्छाई, सच्चाई, द्रढता और मजबूती।
हमारी हटधर्मिता, हमारा पलायन, हमारा बुराईयों से जुडाव।
हमारी आशा, हमारी निराशा, हमारा दुख, हमारा सुख।
 हमारी कलह, हमारी वेचैनी, हमारी हार, हमारी जीत।
 हमारी चिन्ता, हमारी वेख्याली।
 हमारी शान्ती, हमारी अशान्ति।
सभी हमारी सोंच का दर्पण हैं।
एक अच्छी, सच्ची ग्यान जोग द्रण सोंच, हमें मालिक के दरवार में पहुचा सकती है।
वहीं बुरे विचारों से ओतप्रोत मलिन सोंच, हमें चौरासी का रसास्वादन करा सकती है।
आशा और निराशा जीवन की दो धारायें है।
निराशावादी मनुष्य हमेंशां,परेशान ही रहता है।
जबकि एक आशावादी, कठिन, से कठिन समय में भी, विचलित नहीं होता।
कैसी भी विकट परिस्थिती क्यों न हो, उसे विस्वास होता है कि, सब कुछ सही ही होगा।
"आशा एक उसैदी"।
साध का काम है कि, वह ग्यान जोग सोंच रख्खे, मालिक से आश करे, उसके सारे काम पूरे होंगे।
सत्तनाम।
राजमुकट साध

बात पूरे की करो अधूरे में क्या रखा है

बात पूरे की करो
अधूरे में क्या रखा है

बात दान की करो
लोभ में क्या रखा है

बात क्षमा की करो
बदले में क्या रखा है

बात एकांत की करो
भीड में क्या रखा है

बात भक्ति की करो
संसार में क्या रखा है

बात ह्रदय की करो
बुद्धि में क्या रखा है

बात समर्पण की करो
अहंकार में क्या रखा है

बात सत्त की करो
झूठ में क्या रखा है

बात गरीबत की करो
दिखावे में क्या रखा है

बात प्रेम की करो
द्वेष में क्या रखा है

बात सत्तनाम की करो
सांसारिक नाम में क्या रखा है

बात संतोष की करो
लालसा में क्या रखा है

बात धीरज की करो
बेचैनी में क्या रखा है

बात गुरू की करो
चापलूसी में क्या रखा है

बात शील की करो
पराए में क्या रखा है

बात भलाई की करो
बुराई में क्या रखा है

बात ज्ञान की करो
अज्ञान में क्या रखा है

बात मीठी करो
कडवे में क्या रखा है

बात शून्य की करो
शोर में क्या रखा है

मालिक सबको भलो करियौ

सहनता करना बहुत महान काम है । जो सहनता करता है उसके लिये कहा है

सहनशीलता

सरषटि के करता माँड़ के धनी अवगत् आप काशी मे कबीर साहिब के रूप मे बिराजमान हुये और ज्ञान सुनाया  ।
बारहखडी में ज़िक्र है :-

ख खा खुदी कौ छाड कर ग़रीबी गह रहे।
किसी की दुइ गार सर पर सह रहे।।
         कोइ कछु कह जाए ज़बाब नहीं दीजिए ।
         यह ग़म अमरत घट माहे घोल कर पीजिये।।

सहनता करना बहुत महान काम है । जो सहनता करता है उसके लिये कहा है

कहै कबीर वे कब ब मिलै परम स्नेही साध।
जिनका चित समुनदर सा बुधमनता मन धीर
सौ दोसै बिरचै नहीं उनकौ साजन मिले कबीर

साध जो भी काम करे, यह ध्यान में रखकर करे कि, भूल से भी कभी, कोई हुकम अदूली न हो जाये

*तेजराम कहैं सत्त बिचारौ*
सन्त तेजराम कह रहे हैं कि, साध का काम है कि, वह सतगुर साहिब के हुकमों को, अपने मन, अपने बिचारों में बसा ले।
साध जो भी काम करे, यह ध्यान में रखकर करे कि, भूल से भी कभी, कोई हुकम अदूली न हो जाये।
"सतगुर सेती मन परिचावै, तौ कुबध कुती ज्यों भुसती जावै"।
मन परचावै, यानी मन में हर समय सतगुर साहिब की सीख हो।
तब ही बुरी बुद्धि, बुरी सोंच,  और बुराइयों से बचा जा सकता है।
"सतगुर कौ कोई विरला जानै, जो जानै सो शबद पहिचानै"।
सतगुर साहिब को वह विरले बन्दे ही जान पाये, जिन्होंने उनके हुकमों को, पुरी तरह से, समझा, जाना, और मानकर उसे पूरी तरह से अपनाया।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)

अच्छे लेख लिखना, ग्यान जोग, अच्छी बातें करना, अच्छा है

*समाज सुधार*
अच्छे लेख लिखना, ग्यान जोग, अच्छी बातें करना, अच्छा है।
मगर जब तक हम ठोस कुछ नहीं करेंगे, तब तक अच्छे परिणाम नहीं निकल सकते।
उसके लिये हमें पहले, अपने उन रिस्ते नातेदारों को समझाना होगा, जो गलत राह अपना चुके हैं।
जब हम अपने दायरे में, अपनों  से मिलकर, उन्हें समझा बुझाकर, उन्हें सही और गलत का वोध करायेंगे, तब ही हमारा उदेश्य सफल होगा।
अपने व अपने रिस्तेदारों के  बच्चों में सुधार के बीज बो कर हम समाज सुधार की नीव डालने की पहल करें। 
सिर्फ अच्छी बातों से काम बननें बाला नहीं है।
अच्छीं सैधान्तिक बातें, सिर्फ सराहना प्राप्त करती हैं।
ठोस कार्यवाही करके ही उदेश्य पूर्ण होते हैं।
 बातें करो, मगर साथ ही क्रियाशील बनों।
मारग कठिन जरूर है, मगर नामुमकिन भी नहीं है।
करने बाले कठिनाईयों से नहीं डरते।
जो चलते हैं मंजिल वही पाते हैं।
सत्तनाम।
राजमुकट साध

गुरु घर की रोटी,गुरु घर की दाल।छप्पन भोग में भी नही ऐसा कमाल

गुरु घर की रोटी,गुरु घर की दाल।छप्पन भोग में भी नही ऐसा कमाल।गुरु घर का आचार।बदल देता है विचार।गुरु घर का पानी।शुद करे वाणी।गुरु घर के फल और फूल।उतार देती है जन्मों -जन्मों की घूल।गुरु घर की छाया।बदल देती है काया।गुरु घर का प्याज।सौ बीमारियो का इलाज।गुरु घर का रायता।मिलती है चारों और से सहायता।गुरु घर के आम।नई सुबह नई शाम।गुरु घर का हलवा।दिखाता है जलवा।गुरु घर की सेवा।मिलता है मिश्री और मेवा।गुरु घर का स्नान।चारों धाम के तीर्थ के समान।गुरु घर को जो सजाऐ।उस का कुल् सवर जाये।गुरु घर का जो सवाली।उसकी हर दिन होली हर रात दीवाली।।

सतगुर साहिब ने हर युग में सन्तों को सुचेत किया, चेतना दी

*चेतन कर चौरासी मेटी........,
  गुरु म्हारे लाये गत का गैला"।
सतगुर साहिब ने हर युग में सन्तों को सुचेत किया, चेतना दी। आद में महादेव को सुमेर में, सोते से जगाया।
पार्वती ने सतगुर साहिब  को धनकारा दिया।
(ल.)"जब सोते शिव कौ आन जगाया, भुलौं नही जोगी, दूना लाहा"।
 चौथे जुग में भवसागर में आकर सोते संतों को जगाया।
" पहर बारीख मैं महर सतगुर करी आन कै साध सूता जगाया"।
उन्हें वह चेतना दुबारा दी जिसे वह चौथा जुग आते आते खो चुके थे।
सन्तों को चौरासी से बचा कर, सतगुर साहिब ने उन्हें इतनी चेतना, इतना ग्यान दिया कि उनके लिये मुक्ति का मार्ग आसान हो गया।
"उज्वल किया भगत जब दीनी, हम पै छाया सतगुर कीनी।
आज हम सबको भी चेतना की बहुत आवश्यकता है।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)

इस संसार में हम कुछ हैं, या हमारा कुछ है, यही सबसे बडा भरम है

"भरम का बाहिला.............,
              जोर असुरां वहैं"।
सतगुर के मिले सै,जीव त्यारै"।
भरम का वहाव और आसुरी शक्तियों का जोर ही, भक्ति मारग में सबसे बडी रुकावट है।
यह घातक बीमारी, एक दिन चौरासी में पहुचा देगी।
इस संसार में हम कुछ हैं, या हमारा कुछ है, यही सबसे बडा भरम है।
 काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, भय, भरम, तृष्ना, ममता, मान की अधिकता ही, आसुरी शक्तियां हैं।
क्या हम मानने के लिये तैयार है कि यहॉ हमारा कुछ भी नहीं है।
जबकि हमारे सामने देखते देखते, कितने ऐसे चले गये, जिन्होने जान से प्यारी,   संपत्ति,अर्जित करने में, कितनों को सताया, कितनों का दिल दुखाया।
न जाने कितनी लूट खंसोंट की, कितने पाप कर्म किये।
अन्त में सब यहीं छोंड गये।
यह शरीर, यह संसार, मनुष्य को इतना भ्रमित करता है कि, मनुष्य को मरते दम तक, अपना ही लगता है।
आखिरी सांस तक भरम में डूबा मनुष्य, संसार में कमाई सारी दौलत को यहीं छोंड, अपनी आसुरी शक्तियों को संजोये, इस देह से मुक्त हो, दुसरी देह प्राप्त करता है।
पिछले जनम की दौलत तो पीछे ही छूट गयी।
 लेकिन उसे अर्जित करने के लिये जो पाप किये थे, वह पाप की पोटली साथ लग गयी।
 फिर शुरु हुआ वही दौर, क्योंकि आसुरी शक्तियां भी साथ ही आयी हैं।
यही सिलसिला एक दिन मनुष्य को चौरासी में ले जायेगा।
"सतगुर के मिले सै,जीव त्यारै"।
सतगुर साहिब से मिलना यानी उनके हुकमों को मानना।यही एक मार्ग है जो भवसागर से पार उतार सकता है।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)

तुम्हारी समझने और मतलव निकालने की शक्ती शायद कुछ अधिक है।

ध्रुब कुमार साध,
तुम्हारी समझने और मतलव निकालने की शक्ती शायद कुछ अधिक है।
जब ही बिना बिचार किये, तुमने हमारी बात को गलत तरह से परिभांषित किया।
सत्तअबगत सृष्टिकर्त्ता का नाम है।किसी किरतम का नहीं।
हमने कहा है कि सत्तनाम यानी सच्चा नाम, और साधों के लिये एक सत्तअबगत ही सच्चा नाम है।
साध जब सत्तनाम कहते हैं,  उसका एक ही मतलब होता है।  मालिक को याद करना।
 सामने बाला जब जवाव में सत्तनाम कहता है।
इसका मतलव है दोनों ने एक दूसरे से मिलने पर मलिक को याद किया।
सत्तनाम कहने का अभिप्राय है।   मालिक को याद करना, मालिक की याद दिलाना।
पंजावी भी सत्तनाम कहते है।सत्तनाम को वह भी मालिक का नाम ही मानते है मगर वह नानक के लिये कहते हैं।
अब हमें बताओ अराम सुख किस का नाम है।
क्या सही में तुम्हारे पास आराम सुख है या ऐसे ही झूंठमूठ औपचारिकता निभा रहे हो।
सत्तनाम।
राजमुकट साध

 प्राणी इस संसार में अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही इस संसार से जाता है
तथा अपने पाप एबम पुण्य भी अकेले ही भोगता है
संसार में जितने भी संबध है सब मिटने बाले है
केबल एक मालिक से ही हमारा सच्चा संबध है जो कभी नहीं मिटता
इसलिए मालिक के नाम को ही अपने हिरदे में बसाना है जो संग चलने बाला है
मालिक से अरदास करते रहे कारज सब बनते रहेंगे

आज हम जिस स्थान पर बैठे, खडे या स्थापित हैं।

*स्थानान्तरण*
हम सब जानते हैं।
आज हम जिस स्थान पर बैठे, खडे या स्थापित हैं।
बीत कल में इस स्थान पर, कोई और था, और आने बाले कल में, कोई और होगा।
इस परिवर्तनशील दुनियां में  सब कुछ परिवर्तनीय है।
हबा का रुख बदलता है, मौसम का मिजाज बदलता हैं।
पुराने पत्ते झडते हैं, नये पत्ते आते हैं।
बच्चे पैदा होते हैं, बडे होते हैं, बूढे होते हैं, और मर जाते हैं।
यह क्रम यह नियम संसार की रचना करने बाले सृष्टिकर्त्ता अबगत आप का बनाया हुआ है, जो अकाट्य है।
जो पैदा हुआ है वह मरेगा जरूर।
 किसी, किसी को, बुढापा, तो किसी को जवानी भी नसीव नहीं होती हैं।
क्या कभी हमने सोंचा है कि, शरीर से अलग होने के बाद, हमारा प्रानी कहॉ जाता है।
परिबर्तन में वह कौन सा रूप पाता है।
यह मालिक दाता के हॉथ में है, वह जो भी हमें देंगे, जहॉ भी हमें भेजेंगे, सब हमारी करनी पर निर्भर है।
 प्रानी को ही सब कुछ भोगना पडता हैं।
शरीर तो यहीं रह जाता है। और परिवार बाले उसे जलाकर समाप्त भी कर देते हैं।
हमें मोंह करना चाहिये प्रानी का, खूब नाम जपें, अच्छे कर्म करें,इसीसे प्रानी को लाभ होगा।
 लोभ करना चाहिये इन सांसों का, एक भी सांस नाम लेने से खाली न जाये।
 सो तो हम कर नहीं पा रहे।
 बल्कि इसके विपरीत अपना पूरा जीवन संसार की मिटने छुटने बाली वस्तुओं को संजोने, सम्हालने में लगा दिया।
अब आगे क्या होगा किसी को पता नहीं।
नाम साथ में लेकर जाने बाला, निश्चय ही मनुष्य जन्म प्राप्त  करता है।
"नाम का फुरमान ऐसा जासै, औतरे औतार"।
सत्तनाम (राजमुकट साध)

मालिक दाता से अगाध प्रेम, उन पर अटूट विश्वास, पल पल उनके चाहे को देखना

 मालिक दाता से अगाध प्रेम, उन पर अटूट विश्वास, पल पल उनके चाहे को देखना और स्वयं को अहंकार रहित करके अपना तन मन अपने गुरू के चरनों में सौंपना ही सही मायने में सच्चा समर्पण है..

सत्तनाम