!! *आज* *के* *विचार* !!
*सेवा* - *सिमरन* - *संगत*
तन की सेवा *सतगुरु* और साध संगत के चरणो में अर्पण
करने से मनुष्य तन से सुखी हो जाता है। मन से सतगुरु का गुणगान करने से मन में शान्ति आ जाती है और धन की सेवा करने से मनुष्य के पास धन की कमी नहीं रहती है। इस प्रकार मनुष्य के जीवन में सतगुर की अपार कृपा से साध संगत और सिमरन करने से जब सेवा भावना भी आ जाती है। तो इससे मनुष्य के जीवन में खुशियां आ जाती है काम, क्रोध ,लोभ, मोह और अंहकार , परोपकार भक्ति और नम्रता, प्रीत, सत्कार में बदलने से मनुष्य महापुरुष बन जाता है !!
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शब्द को परखना*
*चर्चा करै शब्द को परखै,*
*निर्भय नाम सीख से निरखै ।*
निर्वाण ज्ञान की यह सीख केवल शब्द की चर्चा करने की नहीं, *शब्द को अपने जीवन में परखने* की है । नाम की सच्ची सीख वही है जो सुरति को भय, भरम और मन की चंचलता से निकालकर *निर्भय सत में टिकाए ।*
*भावार्थ :* बोलना सरल है, सुनना भी सरल है; पर *शब्द की कसौटी पर अपनी सुरति, अपनी चाल और अपना जीवन परखना ही असली साधना है ।*
*सार : शब्द की चर्चा बाहर होय, परख भीतर होय; और जब नाम की सीख भीतर उतरै — तभी सुरति निर्भय होय ।*
सब जग सत् स्वरूप है*
ज्ञानी संसार से माने हुए मैं और मेरा सम्बन्ध का त्याग करता है; भक्त एक *सत् करतार* के अतिरिक्त किसी से अपना सम्बन्ध मानता ही नहीं ।
ज्ञानी कहता है — *न मैं, न मेरा ।*
भक्त कहता है — *सब तू, सब तेरा ।*
ज्ञानी अहंता - ममता छोड़ता है, भक्त अपने समस्त अस्तित्व को *सत् करतार के प्रेम, अपनत्व और पूर्ण समर्पण* में अर्पित कर देता है । अन्ततः दोनों में मैं मिटता है और एक *सत् करतार ही अपना सर्वस्व* रह जाता है ।