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दुख है मांग और चाह का होना सुख है अचाह होना

दुख और सुख

दुख है मांग और चाह का होना
सुख है अचाह होना

दुख है अभाव की ओर ध्यान देना और यही सोचना कि मेरे पास क्या नहीं है जो दूसरों के पास है
सुख है भाव की ओर ध्यान देना और यही सोंचना कि मेरे पास क्या है और मैं उसमें कितना त्रप्त हूँ

दुख है कमी ढूँढना
सुख है स्वीकार्यता

दुख है ईर्ष्या और मान की चाहना
सुख है सुमलत, कि जो मिला है वह बहुत है

दुख है शिकायत
सुख है धन्यवाद

दुख है लालसा
सुख है संतोष

दुख है लोभ
सुख है दान

दुख है पराए की चाह
सुख है शील

दुख है बेचैनी
सुख है शांती

दुख है बेईमानी
सुख है ईमानदारी

दुख है अहंकार
सुख है समर्पण

दुख है 'मैं'
सुख है 'वो'

दुख है क्रोध
सुख है करुणा

दुख है बदला
सुख है क्षमा

दुख है अपने नाम की आस
सुख है सत्तनाम की आस

दुख है व्यभिचार
सुख है सदाचार

दुख है विस्मरण (बिसरना)
सुख है स्मरण (सुमरन)

दुख है कि मुझे मिल जाए सब
सुख है तेरा तुझको सौंप दिया सब

दुख है पकडना
सुख है छोड देना

दुख है सिर्फ अपने लिए मांगना
सुख है सिर्फ सबके लिए मांगना

'मेरा' का भाव दुख है,
एक सराय (शरीर) में रात (जीवन) व्यतीत करने पर उस सराय को अपना मान लेना और सदा उसमें रहने की चाहना दुख है
उसी सराय को समय पर छोडने के लिए तत्पर रहने का भाव सुख है

मालिक सबको भलो करियौ

बहुत सुँदर पंक्तियाँ- "संयुक्त परिवार

बहुत सुँदर पंक्तियाँ- "संयुक्त परिवार"

वो पंगत में बैठ के
निवालों का तोड़ना,
वो अपनों की संगत में
रिश्तों का जोडना,

वो दादा की लाठी पकड़
गलियों में घूमना,
वो दादी का बलैया लेना
और माथे को चूमना,

सोते वक्त दादी पुराने
किस्से कहानी कहती थीं,
आंख खुलते ही माँ की
आरती सुनाई देती थी,

इंसान खुद से दूर
अब होता जा रहा है,
वो संयुक्त परिवार का दौर
अब खोता जा रहा है।

माली अपने हाथ से
हर बीज बोता था,
घर ही अपने आप में
पाठशाला होता था,

संस्कार और संस्कृति
रग रग में बसते थे,
उस दौर में हम
मुस्कुराते नहीं
खुल कर हंसते थे।

मनोरंजन के कई साधन
आज हमारे पास है,
पर ये निर्जीव है
इनमें नहीं साँस है,

आज गरमी में एसी
और जाड़े में हीटर है,
और रिश्तों को
मापने के लिये
स्वार्थ का मीटर है।

वो समृद्ध नहीं थे फिर भी
दस दस को पालते थे,
खुद ठिठुरते रहते और
कम्बल बच्चों पर डालते थे।

मंदिर में हाथ जोड़ तो
रोज सर झुकाते हैं,
पर माता-पिता के धोक खाने
होली दीवाली जाते हैं।

मैं आज की युवा पीढी को
इक बात बताना चाहूँगा,
उनके अंत:मन में एक
दीप जलाना चाहूँगा

ईश्वर ने जिसे जोड़ा है
उसे तोड़ना ठीक नहीं,
ये रिश्ते हमारी जागीर हैं
ये कोई भीख नहीं।

अपनों के बीच की दूरी
अब सारी मिटा लो,
रिश्तों की दरार अब भर लो
उन्हें फिर से गले लगा लो।

अपने आप से
सारी उम्र नज़रें चुराओगे,
अपनों के ना हुए तो
किसी के ना हो पाओगे
सब कुछ भले ही मिल जाए
पर अपना अस्तित्व गँवाओगे

बुजुर्गों की छत्र छाया में ही
महफूज रह पाओगे।
होली बेमानी होगी
दीपावली झूठी होगी,
अगर पिता दुखी होगा
और माँ रूठी होगी।।

अन्तःकरण को छूने वाली है ये कविता जिसने भी लिखी है उसको प्रणाम। आगे भेज सकें तो महरवानी होगी।

गंगा में डुबकी लगाकर,तीर्थ किए हज़ार। इनसे क्या होगा,अगर बदले नहीँ विचार।



👉💎 गंगा में डुबकी लगाकर,तीर्थ किए हज़ार।
इनसे क्या होगा,अगर बदले नहीँ विचार।


👉💎 "इस दुनियाँ के हर शख्स को नफरत है "झूठ" से...

मैं परेशान हूँ ये सोचकर, कि फिर ये "झूठ" बोलता कौन है"।


👉💎 "निंदा "तो उसी की होती है
जो"जिंदा" है।
मरे हुए कि तो बस तारीफ ही होती हैं।


👉💎 महसूस जब हुआ कि सारा शहर,
मुझसे जलने लगा है,
तब समझ आ गया कि अपना नाम भी,
चलने लगा है”…


👉💎 सदा उनके कर्जदार रहिये जो आपके लिए कभी खुद का वक्त नहीं देखता है,
और
सदा उनसे वफ़ादार रहिये जो व्यस्त होने के बावजूद भी आपके लिए वक़्त निकालता है।


👉💎 मोक्ष  का  एक  ही  मार्ग  है।
         और  वह  बिल्कुल  सीधा  ही  है।
            अब  मुशकिल   उन्हें  होती  है।
       जिनकी  चाल  ही  टेड़ी  है।


👉💎 हम जब दिन की शुरुआत करते है,
तब लगता है की, पैसा ही जीवन है ..
 लेकिन, जब शाम को लौट कर घर आते है,
तब लगता है, शान्ति ही जीवन है ।


👉💎 फलदार पेड़ और गुणवान व्यक्ति ही झुकते है ,
सुखा पेड़ और मुर्ख व्यक्ति कभी नहीं झुकते ।
कदर किरदार की होती है… वरना…
कद में तो साया भी इंसान से बड़ा होता है.......


👉💎 पानी मर्यादा तोड़े तो  "विनाश"
                          "और"
         वाणी मर्यादा तोड़े तो "सर्वनाश"

इसलिए हमेशा अपनी वाणी पर संयम रखो

जीवन में सारा कुछ, हमारी सोंच पर आधारित है

जीवन में सारा कुछ, हमारी सोंच पर आधारित है।
 हमारी अच्छाई, सच्चाई, द्रढता और मजबूती।
हमारी हटधर्मिता, हमारा पलायन, हमारा बुराईयों से जुडाव।
हमारी आशा, हमारी निराशा, हमारा दुख, हमारा सुख।
 हमारी कलह, हमारी वेचैनी, हमारी हार, हमारी जीत।
 हमारी चिन्ता, हमारी वेख्याली।
 हमारी शान्ती, हमारी अशान्ति।
सभी हमारी सोंच का दर्पण हैं।
एक अच्छी, सच्ची ग्यान जोग द्रण सोंच, हमें मालिक के दरवार में पहुचा सकती है।
वहीं बुरे विचारों से ओतप्रोत मलिन सोंच, हमें चौरासी का रसास्वादन करा सकती है।
आशा और निराशा जीवन की दो धारायें है।
निराशावादी मनुष्य हमेंशां,परेशान ही रहता है।
जबकि एक आशावादी, कठिन, से कठिन समय में भी, विचलित नहीं होता।
कैसी भी विकट परिस्थिती क्यों न हो, उसे विस्वास होता है कि, सब कुछ सही ही होगा।
"आशा एक उसैदी"।
साध का काम है कि, वह ग्यान जोग सोंच रख्खे, मालिक से आश करे, उसके सारे काम पूरे होंगे।
सत्तनाम।
राजमुकट साध

बात पूरे की करो अधूरे में क्या रखा है

बात पूरे की करो
अधूरे में क्या रखा है

बात दान की करो
लोभ में क्या रखा है

बात क्षमा की करो
बदले में क्या रखा है

बात एकांत की करो
भीड में क्या रखा है

बात भक्ति की करो
संसार में क्या रखा है

बात ह्रदय की करो
बुद्धि में क्या रखा है

बात समर्पण की करो
अहंकार में क्या रखा है

बात सत्त की करो
झूठ में क्या रखा है

बात गरीबत की करो
दिखावे में क्या रखा है

बात प्रेम की करो
द्वेष में क्या रखा है

बात सत्तनाम की करो
सांसारिक नाम में क्या रखा है

बात संतोष की करो
लालसा में क्या रखा है

बात धीरज की करो
बेचैनी में क्या रखा है

बात गुरू की करो
चापलूसी में क्या रखा है

बात शील की करो
पराए में क्या रखा है

बात भलाई की करो
बुराई में क्या रखा है

बात ज्ञान की करो
अज्ञान में क्या रखा है

बात मीठी करो
कडवे में क्या रखा है

बात शून्य की करो
शोर में क्या रखा है

मालिक सबको भलो करियौ

साध वही है जो मालिक के हुकम, हर समय, हर हाल में, अपने चित पर रक्खे

साध की पहिचान*
सादा जीवन उच्च विचार।
"साध शीतल बानी बोलै"।
"साध होय टोंटा नहीं बंजैं"।
"तामस तडक साध कैं नाहीं"।
"बदफैलौं देख साध नहीं हंसै"।
"साध तौ सत्त शब्द भेदी, झूंठ सै नहीं काम"।
"और भरमना छांड दे तू, साध नाम कहाव"।
"संहस भरमना छांड दे, तोय सत्त सै आराम"।
"महादेव कहैं हम साध कहामैं"।
साध वही है जो मालिक के हुकम, हर समय, हर हाल में, अपने चित पर रक्खे।
कोई भी गलत काम न करे।
 जहॉ गलत काम हो रहे हों, वहॉ कदापि न जाये।
किसी भी गलत काम से अपने को सदैव्य दूर रक्खे।
गुस्सा क्रोध अहंकार करना साध का काम नहीं है।
साध का काम है, चलते, फिरत, उठते, बैठते, जैसे भी हो, जितना बन पडे, जितना हो सके, ज्यादा से ज्यादा, मालिक का नाम ले।
सन्त बता रहे हैं कि, संसार में तरह तरह के भरम भटकाव हैं, संहस देवी देवताओं का जाप, पूजा, अर्चना हैं।
साध को इन बातों से अपने को दूर रखकर "सत्तअबगत" नाम जपना है।
इस नाम के लेने से ही आराम मिलेगा।
महादेव को जब ब्रह्मा ने अपने जग में बुलाया।
महादेव ने इन्कार कर दिया, वह वहॉ नहीं गये।
क्योंकि वहाँ मांस का सेवन होना था।
यही कसौटी हमारे लिये भी है।
हम पूर्ण निर्भीकता से गलत को गलत कहें।
हम भी हर गलत काम से अपने को दूर रक्खें।
"जामैं शब्द का पारखूं, कोई क्रोडा मंझे"।
"साध की साधना कठिन भाई"।
सत्तनाम।
राजमुकट साध

साध जो भी काम करे, यह ध्यान में रखकर करे कि, भूल से भी कभी, कोई हुकम अदूली न हो जाये

*तेजराम कहैं सत्त बिचारौ*
सन्त तेजराम कह रहे हैं कि, साध का काम है कि, वह सतगुर साहिब के हुकमों को, अपने मन, अपने बिचारों में बसा ले।
साध जो भी काम करे, यह ध्यान में रखकर करे कि, भूल से भी कभी, कोई हुकम अदूली न हो जाये।
"सतगुर सेती मन परिचावै, तौ कुबध कुती ज्यों भुसती जावै"।
मन परचावै, यानी मन में हर समय सतगुर साहिब की सीख हो।
तब ही बुरी बुद्धि, बुरी सोंच,  और बुराइयों से बचा जा सकता है।
"सतगुर कौ कोई विरला जानै, जो जानै सो शबद पहिचानै"।
सतगुर साहिब को वह विरले बन्दे ही जान पाये, जिन्होंने उनके हुकमों को, पुरी तरह से, समझा, जाना, और मानकर उसे पूरी तरह से अपनाया।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)

अच्छे लेख लिखना, ग्यान जोग, अच्छी बातें करना, अच्छा है

*समाज सुधार*
अच्छे लेख लिखना, ग्यान जोग, अच्छी बातें करना, अच्छा है।
मगर जब तक हम ठोस कुछ नहीं करेंगे, तब तक अच्छे परिणाम नहीं निकल सकते।
उसके लिये हमें पहले, अपने उन रिस्ते नातेदारों को समझाना होगा, जो गलत राह अपना चुके हैं।
जब हम अपने दायरे में, अपनों  से मिलकर, उन्हें समझा बुझाकर, उन्हें सही और गलत का वोध करायेंगे, तब ही हमारा उदेश्य सफल होगा।
अपने व अपने रिस्तेदारों के  बच्चों में सुधार के बीज बो कर हम समाज सुधार की नीव डालने की पहल करें। 
सिर्फ अच्छी बातों से काम बननें बाला नहीं है।
अच्छीं सैधान्तिक बातें, सिर्फ सराहना प्राप्त करती हैं।
ठोस कार्यवाही करके ही उदेश्य पूर्ण होते हैं।
 बातें करो, मगर साथ ही क्रियाशील बनों।
मारग कठिन जरूर है, मगर नामुमकिन भी नहीं है।
करने बाले कठिनाईयों से नहीं डरते।
जो चलते हैं मंजिल वही पाते हैं।
सत्तनाम।
राजमुकट साध

जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है

सत्तनाम से सुरत लगाबौ
बूंद की सार्थकता इसी में है कि उसका अस्तित्व सागर में विलीन हो जाए।

जैसे सोने मै मिलै सुहागा ।
ऐसै साध शब्द सै लागा ।।
                      |||||||| "ये ही सत्य हैं" |||||

 Qus→   जीवन का उद्देश्य क्या है ?
Ans→  जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है - जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। उसे जानना ही मोक्ष है..!!



Qus→  जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है ?
Ans→  जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया - वह जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है..!!



Qus→  संसार में दुःख क्यों है ?
Ans→  लालच, स्वार्थ और भय ही संसार के दुःख का मुख्य कारण हैं..!!


Qus→  ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की ?
Ans→  ईश्वर ने संसारकी रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की..!!


Qus→  क्या ईश्वर है ? कौन है वे ? क्या रुप है उनका ? क्या वह स्त्री है या पुरुष ?
 Ans→   कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है। तुम हो, इसलिए वे भी है - उस महान कारण को ही आध्यात्म में 'ईश्वर' कहा गया है। वह न स्त्री है और ना ही पुरुष..!!



Qus→   भाग्य क्या है ?
Ans→  हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है। यह परिणाम ही भाग्य है तथा आज का प्रयत्न ही कल का भाग्य है..!!



Qus→   इस जगत में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?
Ans→   रोज़ हजारों-लाखों लोग मरते हैं और उसे सभी देखते भी हैं, फिर भी सभी को अनंत-काल तक जीते रहने की इच्छा होती है..इससे बड़ा आश्चर्य ओर क्या हो सकता है..!!



Qus→   किस चीज को गंवाकर मनुष्यधनी बनता है ?
Ans→   लोभ..!!



Qus→   कौन सा एकमात्र उपाय है जिससे जीवन सुखी हो जाता है?
Ans →   अच्छा स्वभाव ही सुखी होने का उपाय है..!!



Qus →   किस चीज़ के खो जानेपर दुःख नहीं होता ?
Ans →   क्रोध..!!



Qus→   धर्म से बढ़कर संसार में और क्या है ?
Ans →   दया..!!



Qus→   क्या चीज़ दुसरो को नहीं देनी चाहिए ?
Ans→   तकलीफें, धोखा..!!



Qus→   क्या चीज़ है, जो दूसरों से कभी भी नहीं लेनी चाहिए ?
Ans→   इज़्ज़त, किसी की हाय..!! 



Qus→   ऐसी चीज़ जो जीवों से सब कुछ करवा सकती है?
Ans→   मज़बूरी..!!



Qus→   दुनियां की अपराजित चीज़ ?
Ans→  सत्य..!!



Qus→ दुनियां में सबसे ज़्यादा बिकने वाली चीज़ ? Ans→   झूठ..!!



Qus→   करने लायक सुकून काकार्य ?
Ans→ परोपकार..!!



Qus→   दुनियां की सबसे बुरी लत ?
Ans→ मोह..!!



Qus→   दुनियां का स्वर्णिम स्वप्न ?
Ans→   जिंदगी..!!



Qus→   दुनियां की अपरिवर्तनशील चीज़ ?
Ans→   मौत..!!



Qus→   ऐसी चीज़ जो स्वयं के भी समझ ना आये ?
Ans→   अपनी मूर्खता..!!



Qus→   दुनियां में कभी भी नष्ट/ नश्वर न होने वाली चीज़ ?
Ans→   आत्मा और ज्ञान..!!



Qus→   कभी न थमने वाली चीज़ ?
Ans→   समय..

गुरु घर की रोटी,गुरु घर की दाल।छप्पन भोग में भी नही ऐसा कमाल

गुरु घर की रोटी,गुरु घर की दाल।छप्पन भोग में भी नही ऐसा कमाल।गुरु घर का आचार।बदल देता है विचार।गुरु घर का पानी।शुद करे वाणी।गुरु घर के फल और फूल।उतार देती है जन्मों -जन्मों की घूल।गुरु घर की छाया।बदल देती है काया।गुरु घर का प्याज।सौ बीमारियो का इलाज।गुरु घर का रायता।मिलती है चारों और से सहायता।गुरु घर के आम।नई सुबह नई शाम।गुरु घर का हलवा।दिखाता है जलवा।गुरु घर की सेवा।मिलता है मिश्री और मेवा।गुरु घर का स्नान।चारों धाम के तीर्थ के समान।गुरु घर को जो सजाऐ।उस का कुल् सवर जाये।गुरु घर का जो सवाली।उसकी हर दिन होली हर रात दीवाली।।

एक दिन दो मित्र काफी अरसे बाद एक दूसरे से मिले

एक दिन दो मित्र काफी अरसे बाद एक
दूसरे से मिले
एक मित्र ने दूसरे से सहज ही पूछ लिया
"माँ कैसी है ?"
कुछ पल चुप रहने के बाद दूसरा मित्र
बोला " अच्छी है , दो वर्ष से व्रद्धाश्रम
में है ।आज उसका जन्मदिन है मिलकर
आया हूँ ।"
फिर उसने पहले मित्र से पूछा "तुम्हारी
माँ तुम्हारे साथ ही रहती है ?"
तब उसने दिल को छु देने वाली बात
कही..उसने कहा" मैं अभी इतना बड़ा नहीं
हुआ कि अपनी माँ को रख सकूँ , मैं ही माँ
के पास रहता हूँ जन्म से

सतगुर साहिब ने हर युग में सन्तों को सुचेत किया, चेतना दी

*चेतन कर चौरासी मेटी........,
  गुरु म्हारे लाये गत का गैला"।
सतगुर साहिब ने हर युग में सन्तों को सुचेत किया, चेतना दी। आद में महादेव को सुमेर में, सोते से जगाया।
पार्वती ने सतगुर साहिब  को धनकारा दिया।
(ल.)"जब सोते शिव कौ आन जगाया, भुलौं नही जोगी, दूना लाहा"।
 चौथे जुग में भवसागर में आकर सोते संतों को जगाया।
" पहर बारीख मैं महर सतगुर करी आन कै साध सूता जगाया"।
उन्हें वह चेतना दुबारा दी जिसे वह चौथा जुग आते आते खो चुके थे।
सन्तों को चौरासी से बचा कर, सतगुर साहिब ने उन्हें इतनी चेतना, इतना ग्यान दिया कि उनके लिये मुक्ति का मार्ग आसान हो गया।
"उज्वल किया भगत जब दीनी, हम पै छाया सतगुर कीनी।
आज हम सबको भी चेतना की बहुत आवश्यकता है।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)

इस संसार में हम कुछ हैं, या हमारा कुछ है, यही सबसे बडा भरम है

"भरम का बाहिला.............,
              जोर असुरां वहैं"।
सतगुर के मिले सै,जीव त्यारै"।
भरम का वहाव और आसुरी शक्तियों का जोर ही, भक्ति मारग में सबसे बडी रुकावट है।
यह घातक बीमारी, एक दिन चौरासी में पहुचा देगी।
इस संसार में हम कुछ हैं, या हमारा कुछ है, यही सबसे बडा भरम है।
 काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, भय, भरम, तृष्ना, ममता, मान की अधिकता ही, आसुरी शक्तियां हैं।
क्या हम मानने के लिये तैयार है कि यहॉ हमारा कुछ भी नहीं है।
जबकि हमारे सामने देखते देखते, कितने ऐसे चले गये, जिन्होने जान से प्यारी,   संपत्ति,अर्जित करने में, कितनों को सताया, कितनों का दिल दुखाया।
न जाने कितनी लूट खंसोंट की, कितने पाप कर्म किये।
अन्त में सब यहीं छोंड गये।
यह शरीर, यह संसार, मनुष्य को इतना भ्रमित करता है कि, मनुष्य को मरते दम तक, अपना ही लगता है।
आखिरी सांस तक भरम में डूबा मनुष्य, संसार में कमाई सारी दौलत को यहीं छोंड, अपनी आसुरी शक्तियों को संजोये, इस देह से मुक्त हो, दुसरी देह प्राप्त करता है।
पिछले जनम की दौलत तो पीछे ही छूट गयी।
 लेकिन उसे अर्जित करने के लिये जो पाप किये थे, वह पाप की पोटली साथ लग गयी।
 फिर शुरु हुआ वही दौर, क्योंकि आसुरी शक्तियां भी साथ ही आयी हैं।
यही सिलसिला एक दिन मनुष्य को चौरासी में ले जायेगा।
"सतगुर के मिले सै,जीव त्यारै"।
सतगुर साहिब से मिलना यानी उनके हुकमों को मानना।यही एक मार्ग है जो भवसागर से पार उतार सकता है।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)

तुम्हारी समझने और मतलव निकालने की शक्ती शायद कुछ अधिक है।

ध्रुब कुमार साध,
तुम्हारी समझने और मतलव निकालने की शक्ती शायद कुछ अधिक है।
जब ही बिना बिचार किये, तुमने हमारी बात को गलत तरह से परिभांषित किया।
सत्तअबगत सृष्टिकर्त्ता का नाम है।किसी किरतम का नहीं।
हमने कहा है कि सत्तनाम यानी सच्चा नाम, और साधों के लिये एक सत्तअबगत ही सच्चा नाम है।
साध जब सत्तनाम कहते हैं,  उसका एक ही मतलब होता है।  मालिक को याद करना।
 सामने बाला जब जवाव में सत्तनाम कहता है।
इसका मतलव है दोनों ने एक दूसरे से मिलने पर मलिक को याद किया।
सत्तनाम कहने का अभिप्राय है।   मालिक को याद करना, मालिक की याद दिलाना।
पंजावी भी सत्तनाम कहते है।सत्तनाम को वह भी मालिक का नाम ही मानते है मगर वह नानक के लिये कहते हैं।
अब हमें बताओ अराम सुख किस का नाम है।
क्या सही में तुम्हारे पास आराम सुख है या ऐसे ही झूंठमूठ औपचारिकता निभा रहे हो।
सत्तनाम।
राजमुकट साध

 प्राणी इस संसार में अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही इस संसार से जाता है
तथा अपने पाप एबम पुण्य भी अकेले ही भोगता है
संसार में जितने भी संबध है सब मिटने बाले है
केबल एक मालिक से ही हमारा सच्चा संबध है जो कभी नहीं मिटता
इसलिए मालिक के नाम को ही अपने हिरदे में बसाना है जो संग चलने बाला है
मालिक से अरदास करते रहे कारज सब बनते रहेंगे

आज हम जिस स्थान पर बैठे, खडे या स्थापित हैं।

*स्थानान्तरण*
हम सब जानते हैं।
आज हम जिस स्थान पर बैठे, खडे या स्थापित हैं।
बीत कल में इस स्थान पर, कोई और था, और आने बाले कल में, कोई और होगा।
इस परिवर्तनशील दुनियां में  सब कुछ परिवर्तनीय है।
हबा का रुख बदलता है, मौसम का मिजाज बदलता हैं।
पुराने पत्ते झडते हैं, नये पत्ते आते हैं।
बच्चे पैदा होते हैं, बडे होते हैं, बूढे होते हैं, और मर जाते हैं।
यह क्रम यह नियम संसार की रचना करने बाले सृष्टिकर्त्ता अबगत आप का बनाया हुआ है, जो अकाट्य है।
जो पैदा हुआ है वह मरेगा जरूर।
 किसी, किसी को, बुढापा, तो किसी को जवानी भी नसीव नहीं होती हैं।
क्या कभी हमने सोंचा है कि, शरीर से अलग होने के बाद, हमारा प्रानी कहॉ जाता है।
परिबर्तन में वह कौन सा रूप पाता है।
यह मालिक दाता के हॉथ में है, वह जो भी हमें देंगे, जहॉ भी हमें भेजेंगे, सब हमारी करनी पर निर्भर है।
 प्रानी को ही सब कुछ भोगना पडता हैं।
शरीर तो यहीं रह जाता है। और परिवार बाले उसे जलाकर समाप्त भी कर देते हैं।
हमें मोंह करना चाहिये प्रानी का, खूब नाम जपें, अच्छे कर्म करें,इसीसे प्रानी को लाभ होगा।
 लोभ करना चाहिये इन सांसों का, एक भी सांस नाम लेने से खाली न जाये।
 सो तो हम कर नहीं पा रहे।
 बल्कि इसके विपरीत अपना पूरा जीवन संसार की मिटने छुटने बाली वस्तुओं को संजोने, सम्हालने में लगा दिया।
अब आगे क्या होगा किसी को पता नहीं।
नाम साथ में लेकर जाने बाला, निश्चय ही मनुष्य जन्म प्राप्त  करता है।
"नाम का फुरमान ऐसा जासै, औतरे औतार"।
सत्तनाम (राजमुकट साध)

मालिक दाता से अगाध प्रेम, उन पर अटूट विश्वास, पल पल उनके चाहे को देखना

 मालिक दाता से अगाध प्रेम, उन पर अटूट विश्वास, पल पल उनके चाहे को देखना और स्वयं को अहंकार रहित करके अपना तन मन अपने गुरू के चरनों में सौंपना ही सही मायने में सच्चा समर्पण है..

सत्तनाम

लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पायी। बडों ने जो बोया है, छोटों ने वही काटा हैं।

लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पायी।
 बडों ने जो बोया है, छोटों ने वही काटा हैं।
हम जो बो चुके या बोने जा रहे हैं।
 हमारी आने बाली पीढियां वही काटेंगी।
मेल प्रेम,भाई चारे की  फसलें, जब ही लह लहायेंगी।
 जब घृणा और नफरत समूल नष्ट हो जायेगी।
स्वत: कुछ नहीं होता सब कुछ करना पडता है।
गलत काम का नतीजा कभी अच्छा नहीं होता।
बोया पेंड बबूल का तौ आम कहॉ सै खाय।
हमेंशा अच्छा सोंचो,अच्छा करो।
शान्त रहोगे तो अच्छा ही पाओगे।
हमता, ममता, दुश्मन भारी, मान मगज हैं, बडी बीमारी।जीतै इनसै बडा खिलाडी, हार गया वह रहा अनाडी।
सत्तनाम
राजमुकट साध

समाजिक मान्यतायें धरासायी होती जा रही हैं।

 *चेतना (समाजिक समाधान)*
 किसी ज्वलंत समस्या पर टीका टिप्पडी करना या लेख लिखना अच्छी बात है।
मगर यह कोई समाधान नहीं है।
आज हमारी समाजिक व्यवस्था का ताना बाना, अव्यवस्थित है।
कभी हमारे समाज का संचालन ग्यानवान, विचारवान सचरित्र साधों के द्वारा होता था।
जिनके कुछ नियम कायदे थे।
पहले परसाद माफक और खालसा हर किसी से नहीं लिया जाता था।
आज गुटबंदी का बोलबाला है।
 आज हमारी सोंच है, सिजल होनी चाहिये, पैसा आना चाहिये, चांहे कहीं से आये।
कभी हमारे समाज में खानपान और चरित्र की प्रधानता थी।
आज पैसे की प्रधानता है।
कभी ग्यानबार्ता (बतकई)ग्यानवान और त्यागी साध सुनाते थे।
जिनका प्रभाव इतना था कि कोई अनैतिक काम करने बाला, समाजिक कामों में पीछे बैठता था।
आज अनैतिकता का बोलबाला है।
समाजिक मान्यतायें धरासायी होती जा रही हैं।
छोटी छोटी बातें पर परिवार टूट रहे है।
खानपान और चरित्र, इनके बारे में हमने बोलना या सोंचना ही बन्द कर दिया है।
हम आधुनिकता की अंधी होड में, भूलते जा रहे हैं अपनी पुरानी परंपराओं को।
तलाक रूपी भयानक अजगर ने समाज में प्रवेश पा लिया है।
अगर समय रहते हमारी चेतना बापस नहीं लौटी, तो हम कल्पना करें, हमारा प्यारा समाज कहाँ होगा।
पार्टीवंदी, गुटवंदी, इन सबसे ऊपर होता है समाज।
क्योंकि समाज ही व्यक्ति की पहिचान है।
हर काम के लिये हमारे पास समय है, इसके लिये भी समय निकालो।
अगर समाज में पनप रही बुराइयों को रोकना है तो, आगे बढो और एक जुटता से मुकावला करो।
सत्तनाम ।
राजमुकट साध

हमारा दुख,सुख, हमारी मानसिकता, हमारी सोंच का दर्पण है।

*सबके,सुख,दुख,अपने,अपने*
हमारा दुख,सुख, हमारी मानसिकता, हमारी सोंच का दर्पण है।
हमें जहॉ जो अच्छा लगता है, हमारा चित मन भी वहीं उसी में होता है।
हमारा चित मन जहॉ होता है, हमारा सुख दुख भी उसी से जुडा होता है। हमारी दशा खराब या सही उसी के अनुकूल होगी।
वह जैसा होगा हम भी वैसे ही हो जायेंगे।
उसका टूटना, उसका रूठना, उसकी झलक, उसका रुझान, हमारे जीवन में जो प्रभाव डालते हैं, उसी पर टिका है, हमारी जिन्दगी का पूरा दारोमदार।
हमारी शान्ती हमारी अकुलाहट हमारी वेचैनी, हमारा सुख दुख, हमारा सारा बजूद, हमारा पूरा जीवन उसी के साथ जुडा है।
 हमारी सोंच पर वह जो प्रभाव डालता हैं, हम बैसे ही हो जाते हैं।
हमारा दुख सुख भी उसी से जुडा रहता हैं, हम उसी के अनुरुप ढल जाते हैं।
अगर वहॉ सब कुछ हमारी सोंच के अनकूल है, तो हम सुखी हैं।
अगर वहॉ कुछ भी हमारी सोंच के प्रतिकूल है, तो हम दुखी है।
इतने क्षणिक हैं हम।
हमारा दुख सुख भी इतना ही क्षणिक है।
जो समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।
अगर हमारा मन संसार से जुडा है तो हम साधारण मनुष्य हैं।
मनको मालिक से जोडकर हम साध का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)

सच्चा है मालिक से जुडना, उनका नाम जपना, उन पर विस्वास रखना

*झूंठ कौ छांड दे,सांच त्यारै* झूंठा है यह संसार और इससे मन का विशेष जुडाव।
सच्चा है मालिक से जुडना, उनका नाम जपना, उन पर विस्वास रखना।
सन्त कह रहे हैं।
"शबद सच्चा, पिन्ड कच्चा, समझ अनभै ग्यान, सत्त सै वेमुख्ख हैं, जिव जांय नरक की खान"।
यह शरीर कच्चा है। सत्तअबगत नाम सच्चा है।
हे प्रानी समझ तुझे किसका साथ करना है।
अनभै ग्यान यानी अबगत आप की भक्ती करना।
जिसने नाम जपना छोंड दिया, वही वेमुख कहे जायेंगे।
 उनके लिये नरक का मार्ग दूर नहीं है।
मालिक सच्चे हैं, उनका दिया सत्तअबगत नाम सच्चा है, उनकी सीख, उनका ग्यान सच्चा है।
हे मन समझ तुझे किससे जुडना है।
मालिक से, उनके नाम और ग्यान से, जुडकर ही भवसागर पार किया जा सकता है।
अपने अहंम पर विस्वास करके हम मालिक को खो सकते हैं। मालिक पर विस्वास करके हम अपने अहंम को खो सकते हैं।
हे मन फैसला तेरे हॉथ में है। तुझे क्या खोना और क्या पाना है।फैसला तेरे हॉथ में है।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)