कबीर साहब का पाप और गंगा स्नान के बारे में दोहा
पुरे वर्ष करते रहे,
एक एक करते पाप।
एक दिन गंगा नहाके,
करवा लेते माफ।
कहे कबीर समझाये,
वाह रे खूब है पापी।
आप ही करता पाप,
आपही मानता माफी।।
अर्थ -
पुरे साल भर पाप करतेे हो और गंगा में डुबकी लगाकर ये मान लेते हो की पाप धुल गए और मन पवित्र हो गया। आप पाप करते हो और गंगा में डुबकी लगाकर मान लेते हो की पाप धूल गए, माफ़ी मिल गयी।
कुछ सवाल -
1) क्या आप मानते है आप सालभर पाप करोगे और गंगा में साल में एक दिन डुबकी लगाकर पाप धुल जायेंगे?
2) इस तरह गंगा में डुबकी लगाकर आपकी अपराधी (guilt) की भावना दूर होगी?
3) गंगा में डुबकी लगाकर या दूसरा कोई भी कर्मकांड करकर आपको पापो से मुक्ति मिलेगी?
4) साल में एक दिन डुबकी लगाकर पाप धो लेंगे और फिर पुरे साल पाप करने के लिए तैयार और फिर गंगा में डुबकी लगाकर पाप धो लेंगे और फिर साल भर पाप करने के लिए तैयार.. क्या ये संभव है? क्या आप गंगा में डुबकी लगाकर अपने आपको पाप करने की permission दे रहे है? आप दुनिया को बेवकूफ बना सकते है, लेकिन अपने अंतर्मन को कैसे बेवकूफ बनाओगे?
5) कबतक आप केवल तन को धोकर पाप मुक्त बनने की बात करते रहोगे?
तन से जादा मन से अंदर से धोना और अंतर्मन को अंदर से बदलना ये महत्वपूर्ण है।केवल तन धोने से feeling better होगा लेकिन getting better नही होगा। getting better के लिये मन को अंदर से बदलना पड़ेगा।