ॐ श्री हनुमते नमः

।।ॐ श्री हनुमते नमः ।।

।। सर्प दोष और दुर्भाग्य से छुटकारा पाने का सरल और सिद्ध उपाय ।।

।। “श्रीहनुमत्-कालसर्पपीडाहर स्तवन” ।।

कालसर्प दोष से परेशान हैं? यह एक स्तोत्र बदल सकता है आपकी किस्मत।

राहु-केतु की पीड़ा से मुक्ति चाहिए? हनुमान जी का यह रहस्य जानिए।

जीवन में अचानक रुकावटें क्यों आ रही हैं? कारण और समाधान दोनों यहाँ।

।। श्रीहनुमत्-कालसर्पपीडाहर स्तवन ।।

​​॥ विनियोगः-अस्य श्री हनुमत् कालसर्प पीडा निवारण स्तोत्र मन्त्रस्य, भगवान् शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्री एकादशमुखी हनुमान देवता, ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः, राहु-केतु जनित कालसर्प एवं षोडश-नाग दोष शान्त्यर्थे जपे विनियोगः।

​॥ अथ स्तोत्रम् ॥

​ १. राहु-दर्प-दलु:
राहु-ग्रस्ते यदा सूर्ये, मुक्तवान् यः क्षणात् विभुः।
स मे राहु-कृतं दोषं, हन्तु देवः कपीश्वरः॥

​ २. केतु-पीडा-हर:
धूम्र-वर्णं ध्वजा-रूपं, केतु-पीडा-निवारकम्।
पुच्छ-ज्वाला-करालं च, ध्यायेत् पावन-सम्भवम्॥

​ ३. नाग-पाश-विमोचक:
लक्ष्मणस्य जय-दात्री, नाग-पाश-विमोचनी।
शक्तिः सा हनुमद्-रूपा, कालसर्पं व्यपोहतु॥

​ ४. अष्ट-नाग स्मरण (प्रथम):
अनन्तं कुलिकं चैव, वासुकिं च च तक्षकम्।
कर्कोटं शंखपालं च, महापद्मं च शंखचूड़म्॥

​ ५. अष्ट-नाग स्मरण (द्वितीय):
पद्मं च कम्बलं चैव, अश्वतरं च धृतराष्ट्रम्।
बलाहकं च मणिनागं, ऐरावतं च कौख्यकम्॥

​ ६. विष-शमन:
एतेषां षोडशानां च, नागानीं विष-नाशनम्।
हनुमत्-पाद-घातेन, सर्वे यान्तु दिगन्तरम्॥

​ ७. तंत्रमय विग्रह:
दश-बाहुं त्रिनेत्रं च, सर्व-शस्त्र-समन्वितम्।
पाशाङ्कुश-धरं धीरं, ध्यायेत् काल-भयापहम्॥

​ ८. विष-निवारण विग्रह:
गरुड़-ध्वज-संकाशं, सर्प-भूषण-भूषितम्।
विष-वीर्य-हरं देवं, नमामि पवनात्मजम्॥

​ ९. एकादश-रुद्र प्रभाव:
एकादश-मुखं रुद्रं, घोर-रूपं महाबलम्।
अनन्त-कुलिका-दीनां, सर्पाणां भय-नाशनम्॥

​ १०. वज्र-देह एवं यज्ञोपवीत:
वज्र-कायाय वीराय, नाग-यज्ञोपवीतिने।
सर्व-कल्याण-कर्त्रे च, नमोऽस्तु हनुमन्-मणे॥

​ ११. बीज मंत्र:
ॐ ह्रां ह्रीं राहु-केतु-भ्यां, हुं फट् कार-मण्डितम्।
कालसर्प-विनाशाय, हनुमन्तं नमाम्यहम्॥

​ १२. रक्षा कवच:
यत्र यत्र स्थितः सर्पः, पीडां कुर्वन्ति मानवे।
तत्र तत्र हनूमान् वै, रक्षां करोतु सर्वदा॥

​ १३. फलश्रुति:
इति ते कथितं दिव्यं, कालसर्प-विनाशनम्।
यः पठेत् प्रयतो नित्यं, स सर्वजयमाप्नुयात्॥

विनियोग का अर्थ=

इस स्तोत्र का जप भगवान शिव को ऋषि मानकर, अनुष्टुप छंद में, एकादशमुखी हनुमान जी को देवता मानकर किया जाता है। इसका उद्देश्य राहु-केतु से उत्पन्न कालसर्प दोष और सर्प दोष की शांति है।

श्लोक अनुसार अर्थ=

1. राहु दोष नाशक
जब सूर्य को राहु ग्रसित करता है (ग्रहण लगता है), तब जिस हनुमान जी ने तुरंत उसे मुक्त किया, वे ही मेरे राहु से बने दोषों को दूर करें।

2. केतु पीड़ा हर
केतु के धूम्र (धुएँ जैसे) स्वरूप को शांत करने वाले, अग्नि समान तेजस्वी हनुमान जी का ध्यान करने से केतु की पीड़ा दूर होती है।

3. नागपाश से मुक्ति
जैसे हनुमान जी ने लक्ष्मण जी को नागपाश से मुक्त कराया, वैसे ही वे कालसर्प दोष को समाप्त करें।

4–5. अष्ट एवं षोडश नाग स्मरण
अनंत, वासुकी, तक्षक आदि सभी प्रमुख नागों का स्मरण किया गया है, जो कालसर्प दोष से जुड़े माने जाते हैं।

6. विष शमन
हनुमान जी के चरणों के प्रभाव से इन सभी नागों का विष नष्ट हो जाता है और वे दूर चले जाते हैं।

7. तांत्रिक स्वरूप ध्यान
हनुमान जी के दस भुजाओं और तीन नेत्रों वाले, शस्त्रधारी रूप का ध्यान करने से भय और संकट दूर होते हैं।

8. विष निवारण
गरुड़ के समान तेजस्वी और सर्पों को नियंत्रित करने वाले हनुमान जी सभी विष और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करते हैं।

9. एकादश रुद्र रूप
हनुमान जी रुद्र के अवतार हैं, उनका यह रूप सभी सर्पों के भय को समाप्त करता है।

10. वज्र शरीर
वज्र समान शरीर वाले, नागों को यज्ञोपवीत रूप में धारण करने वाले हनुमान जी सबका कल्याण करते हैं।

11. बीज मंत्र
यह मंत्र विशेष रूप से राहु-केतु और कालसर्प दोष को समाप्त करने वाला है।

12. रक्षा कवच
जहाँ कहीं भी सर्प या सर्पजन्य पीड़ा हो, वहाँ हनुमान जी सदैव रक्षा करते हैं।

13. फलश्रुति
जो व्यक्ति इस स्तोत्र का नित्य श्रद्धा से पाठ करता है, उसे सभी कार्यों में विजय प्राप्त होती है।

।। पाठ करने के लाभ ।।

1=कालसर्प दोष शांति
कुंडली में राहु-केतु के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।

2=सर्प दोष से मुक्ति
नाग दोष, पितृ दोष से संबंधित समस्याओं में राहत मिलती है।

3=अचानक आने वाली बाधाओं का नाश
जीवन में रुकावटें, विघ्न और अड़चनें कम होती हैं।

4=भय और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा
डर, बुरे सपने, मानसिक तनाव कम होता है।

5=स्वास्थ्य में सुधार
विशेष रूप से विष, रोग और अज्ञात परेशानियों में लाभ मिलता है।

6=कार्य में सफलता और विजय
नौकरी, व्यापार और जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों में सफलता मिलती है।

7=आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि
आत्मविश्वास, साहस और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

।। पाठ विधि (संक्षेप में) ।।

मंगलवार या शनिवार से शुरू करें

हनुमान जी के सामने दीपक जलाकर बैठें

कम से कम 11 या 21 बार पाठ करें

40 दिन नियमित करने से विशेष फल मिलता है।

जय हनुमान जी ।