एक बार प्रसिद्ध उपन्यासकार नानक सिंह जी कहीं बोल रहे थे।
एक महिला ने उनसे सवाल किया—
“नानक सिंह, तुमने इतने सामाजिक उपन्यास लिखे, इतना कागज़ खराब कर दिया, पूरी ज़िंदगी समाज सुधार के लिए लगा दी… लेकिन क्या तुम्हारे कहने से समाज सुधर गया?”
नानक सिंह जी ने बड़ी सहजता से पूछा—“बीबी, आपके घर की सफाई कौन करता है?”
“जी, मैं करती हूँ।”
“कितने साल से?”
“बीस साल से।”
“उससे पहले कौन करता था?”
“जी, मेरी सास करती थी।”
“तुम्हारी सास से पहले कौन करता था?”
“जी, मेरी सास की सास करती होंगी।”
“तो फिर तुम ही बताओ, तुम्हारे घर की सफाई होते कितना समय हो गया?”
“सत्तर साल तो हो ही गए होंगे।”
“तो बताओ, क्या तुम्हारे घर में कूड़ा आना बंद हो गया?”
महिला बोली—
“यह कैसे हो सकता है, कूड़ा तो रोज़ ही होता है, रोज़ साफ करना पड़ता है।”
नानक सिंह जी मुस्कुराकर बोले—
“तो बीबी, यही बात समाज पर भी लागू होती है। तुम्हारे घर की सफाई सत्तर साल से हो रही है, लेकिन कूड़ा आना बंद नहीं हुआ। फिर तुम सफाई करना क्यों नहीं छोड़ देतीं? क्योंकि कूड़ा तो आता ही रहेगा।”
“समाज भी एक डस्टबिन की तरह है, इसमें रोज़ कूड़ा आता रहेगा। आपको सफाई करने की अपनी जिम्मेदारी निभाते रहना चाहिए, अपनी क्षमता के अनुसार अपना काम करते रहना चाहिए। अगर आप रुक गए, तो समाज एक दिन उस कूड़े के ढेर के नीचे दब जाएगा।”
“इसीलिए मैं अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूँ। मैं कितना सफल हो रहा हूँ या असफल—इस बारे में नहीं सोचता। बस जितनी सफाई कर सकता हूँ, करता जा रहा हूँ।” 👍