मालिक की अति दया महर से अनेकों

🏦जयपुर चौकी🏦
मालिक की अति दया महर से अनेकों सथूल मंडपों की स्थापना के पश्चात एक और स्थूल खंभ और मंगलमय मंडप छव गया।

ऐसे अनेकों स्थूल खंभ और मंडपों की छत्र छाया में बैठकर हम सभी प्राणी ने क्या(त्याग किया)खोया और क्या(ग्रहण किया) पाया हैं। 

बहुत अति विचारणीय विचार हैं कि हम सभी प्राणी मात्र ने इस तन मन और धन के अद्भुत उपयोग का कितना सदुपयोग किया हैं ?
कितना सार्थक बनाया हैं ?

प्रत्येक प्राणी के स्व आंकलन ही सार्थकता कितनी सफल हुई हैं।

मालिक की दया महर से स्थूल छत्र की आन बान और मर्यादा का विशेष महत्व हैं। 

इस स्थूल छत्र के नीचे बैठकर ईर्ष्या और घृणा का त्याग करके मेल प्रेम से एकत्रित होकर एक नाम का चाव और सृष्टि कर्ता के हुक्म मानने का पूर्णं भाव रखना हीं पूर्णं सदुपयोग हैं।

इस छत्र के तले बैठने का सौभाग्य पाकर भी काम,क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार का उन्मूलन नहीं कर पाए तो बहुत भारी खामी हैं।

प्राणी मात्र का स्वंय के साथ अति भारी धोखा हैं।

इस भाँति के छत्र के नीचे बैठकर तन मन की साधना की  पूर्णं प्रतिज्ञा करना हीं, इसका महत्व और मान  मर्यादा को समझना हैं।

इस विशेष छत्र का अद्भुत बंधन हैं यहां पर  मात्र आना और जाना हीं काफी नहीं हैं।
 
पूर्णं मर्यादा में ढलना हीं इस विशेष छत्र का पूर्णं महत्व और सम्मान हैं।

यदि यहां(इस छत्र के नीचे) बैठने में सफलता हासिल कर पाये तो सृष्टि कर्ता की छत्र छाया(महर) निश्चित हीं हासिल हैं।

यह स्थान अनेक भांति के प्राणियों को एकाग्रचित करने का सूचक हैं मेल प्रेम और एकता का प्रतीक हैं।

यहाँ एकत्रित होकर मेल प्रेम  का भाव भर जाने क पश्चात सभी प्राणी एक गुरु के एक हीं समान सिख हैं।

यहाँ ना कोई छोटा हैं, ना हीं  कोई बङा हैं,
ना कोई गरीब हैं,ना  हीं कोई अमीर हैं,
ना हीं कोई उंच-नीच के भाव हैं।
 ना हीं कोई वरण और श्रेणी हैं।
ना कोई गांव हैं ना हीं कोई देश हैं।

सामाजिक जीवन के दौरान मेल प्रेम के बिगाङ में दो भाँति (दुबाति) के भाव रखना दोजख (नर्क) का द्वार हैं।

हम सभी प्राणी एक हीं श्रेणी में हैं हमारे सभी के पालनहार भी एक हीं हैं दो मानना दुराचार का प्रतीक हैं।
     ( सतनाम)