इस साखी में कौन कह रहा है कि मेरा मुझ में कुछ नहीं ? क्या सौंपने की बात हो रही है ? क्या शरीर कह रहा है और शरीर सौंपने की बात हो रही है ? बिल्कुल भी नहीं । पर दुनिया में तोह गुरुवाई का धंधा ही शरीर आधारित चल रहा है । गुरु चेलों के शरीर को अपने शरीर से जोड़ रहे हैं, सारी उम्र चेलों को बंधुआ मजदूर बना देते हैं, आश्रमों में मुफ्त की मजदूरी करवाते हैं और कहते कि कि तुमने शरीर गुरु को सौंप दिया है, तुम गुरु की सेवा कर कर रहे हो, यह कैसी गुरु सेवा हुई, शोषण को गुरु सेवा नाम दे दिया ।
इस साखी में सुरती कह रही है शब्द गुरु से, कि मेरा अपना कोई वजूद नहीं है, मैं तुमसे ही पैदा हुई हूं, तुमसे बिछड़ने के बाद मन माया के चक्कर में फंस गई । पर अब मैं तुमसे ही अरदास करती हूं, मैं खुद को तुम्हें सौंपती हूं, मुझे तू अपने भीतर ही समा ले । जैसे नदी पैदा होती है समंदर से ही, समंदर ही बादल बनकर बरसता है, नदी बनता है, फिर नदी समंदर में गिर कर समंदर ही हो जाती है ।
यहां पर सुरती को जरूरत होती है उसके अपने शब्द स्वरूप (आत्म स्वरूप) के ज्ञान की, उसे यह ज्ञान देहधारी गुरु से ही मिलता है, देहधारी के माध्यम से आत्म ज्ञान चलाने वाले परमात्मा खुद होते हैं । पर आत्म ज्ञान देने वाला गुरु कभी भी आपकी देह को अपने साथ नहीं जोड़ता और न ही आपको बंधुआ मजदूर बनाएगा । वो आपको अकेला कर देगा, कि अब अपने आत्म स्वरूप की भक्ति करो और आत्म ही हो जाओ, तुम्हें अब मेरे सहारे की कोई जरूरत नहीं है ।
सतनाम ।