मैं नहीं, मेरा नहीं
जैसे भूखा अन्न चाहता है, प्यासा जल चाहता है, ऐसा लिखने अथवा पढ़ने में हो सकता है इस बोलता / जिभ्या से थोड़ा अटपटा सा लगे प्रत्युत अकाट्य सत्य यही है कि इस बात को प्रत्येक प्राणी / मनुष्य / भावी साधक मान लें कि *सब कुछ सत् करतार का है* । अगर एक प्राणी / मनुष्य / भावी साधक सत् करतार की अनुभूति चाहता है तो सबसे पहले यह बात धारण करनी चाहिए कि इस प्राणी / मनुष्य / भावी साधक की चीज कोई नहीं है । ' *मैं* ' भी मेरी नहीं है, प्रत्युत सत् करतार की है ! यह पहली बात है । इसी से शुरुआत होनी चाहिए ।