जिन संतो के मन में सच्चे धर्म पर चलने की चाह

*एकां नर उलगाना जी,
               जिनकै साँचे दीन री आश*
दीन,- धर्म।
जिन संतों के मन में सच्चे धर्म पर चलने की चाँह (आश) थी,
उन्होंने ही सतगुर साहिब के बताये, सही और सच्चे, धर्म के मार्ग को पहिचाना।
जिसने मन से, सतगुर साहिब की सीख को माना, और उस पर ही चले,
वही संत कलजुग से छलांग लगाकर सतजुग में पहुच सके।
"कलजुग काट किया सिरपा धर, सतजुग ऐन कमाया"।
सिरपा धर,- सिर पर पैर रखकर।
ऐन,- स्थान।
सतगुर साहिब के हुकमों पर अमल करके, सतबादी साधों नें अपने अन्दर व्याप्त कलजुगी चालों को काटकर, उसके सर पर पैर रखकर, सतजुग में अपने लिये स्थान बनाया (कमाया)।
जो संत सतजुग में पहुँचे, उनकी लगन और तलब इतनी अधिक थी कि, उन्हें बारह बरस की कमाई, एक दिन की लगी।
संसार की सारी चाँहनाओं को त्यागकर, जिनकी पूरी लगन नाम और ग्यान से लग गयी, सिर्फ वही संत सतजुग की पूरी कमाई करके, भवसागर पार कर सके।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)।