ममता और अहंम को मेटकर, जो सतगुर साहिब के हुकमो को मानें और उन हुकमो पर चले ।

*सतगुर कौ जो सिर पै राखै,
         किरतम सब ही मन सै त्यागै*।
अपनी हमता, ममता, और अहंम को मेंटकर, जो सतगुर साहिब के हुकमों को ही मानेंगा,
वही संसारी ढ़ोग ढ़कोसलों और किरतम की आश से बच सकेगा।
"ईमान जो मन की धारना, डिगै नहीं कहीं और"।
संतों ने संसारी वस्तुओं का मोंह त्यागकर, अपना सर्वस्व ईमान गुरू के हुकम मानने,  उनका अनुशरण करने में ही लगाया।
"फुरमाये के माफक पहुँचा, हुकम किया सोई छाजा"।
गुरू ने जो भी फुरमाया, संतों को वही नें वही किया।
पूरे जहाँन में उन्हें सिर्फ गुरू के हुकम ही अच्छे लगे।
"भगत भेद और जाहिरी, संतन किया उपाय"।
सतगुर साहिब ने उन्हें जो भक्ति का भेद बताया, यानी ग्यान दिया,
संतों ने अक्षरस उसी का पालन किया।
"इस पैंड़े चलै ना आवै, टोंटा, और रहा कलजुग का खोंटा"।
संत कह रहे हैं कि, एक यही  ऐसा मार्ग है, जिस पर जितना चलोगे, उतना लाभ प्राप्त होगा।
बाँकी जितने मार्ग हैं, सब कलजुगी छल, परपंच, झूँठ, लूट, और खोंट से भरे हुये हैं।
पडित, पुजारी, मुल्ला, पादरी, सभी, तरह तरह की चमत्कारी, झूँठी कहानियाँ, किस्से सुनाकर, थोड़े से पैसे के लिये दुनियां को भरमाकर, अपनी दुकानें चला रहे हैं।
"उनकी सीख सुनौ मत कोई, उन मनषा देही योंही खोई"।
साध का काम है कि, वह उनकी बातो को हरगिज न सुने,
वह तो अपना जीवन बरबाद कर ही रहे हैं, सुनने बाला अगर उनकी बातों के जाल में फंस गया, तो वह भी, अपना अहित ही करेगा।
सत्तनाम।(राजमुकट साध)।