कथनी कथे अपार ।
इन बातों से नही पाइये,
साहिब का दीदार ।।
*कबीर साहेब*
जो मनुष्य सतगुरु की वाणी एवं वचनों को स्वयं आत्मक्षात करके जीवन नही जीता, इससे परे केवल उपदेशात्मक व्याख्यान दूसरों को देता है अर्थात केवल दुसरो के समक्ष ज्ञानी होने का दिखावा करता है । इसप्रकार से कृत्य करने वाले को कभी भी मालिक दाता जी का दीदार नही हो सकता ।
भाव यह है कि केवल उपदेश देने से मालिक दाता जी नही मिलते,उस ज्ञान को आत्मसात करने से मालिक दाता जी की अनुभूति होगी ।। " मन मे समझे हू मै ग्यानी सतगुर कह महा अग्यानी। ।
ऐ जी करनी बीन कथनी कथै अज्ञानी दिन रात , कुकर समान भूसत फिरै और सुनी सुनाई बात ।। ऐ जी करनी का रजमा नही और थोथे बान्दे तीर, बिरह बान जिनको लगा तो बिकल होत शरीर ।।
उपर लिखी बात कबीर साहेब ने संसारिक पाखण्डीयो के सन्दर्भ में कही हैं साध संगत के लिए नही है क्योंकि साध एवं बाई सगंत में सलाह मिलती हैं तभी ग्यान के जिक्र करते हैं