जहा अपना अभीमान नहीं होता, वहां साधक को बाधा नहीं लगती, बाधा वही लगती जहा अपने मे योग्यता /बल /समझदारी/विद्या /वैराग /जप
आदि का अभीमान होता है, भक्त अपने आप मे कोई योग्यता नहीं देखता, अपने आप को अयोग्य समझता है, इसलिए उसने मालिक की योग्यता काम करती है!
एक मालिक की शरन मे हों जाये तो सब काम मालिक स्वम करते है!!