सतनाम


सत की भक्ती बिना किसी बाहरी चीज का सहारा लिये निर्मल मन के द्वारा की जाती है| इसमे किसी मंन्दिर न किसी मस्जिद न कोई पंडा न पादरी मुल्ला की भी जरूरत नही है ना ही किसी किस्म की साम्रगी आवश्यकता है न रोली चाहिये न चंदन न मोमबती न अगरबती न चन्दन न चादर न पर्शाद न किसी किस्म पुजा साम्रगी या हवन के लिये घी की भी जरूरत नही है न ढोल चाहिये न लाउड स्पीकर न तीरथ न वरत न दर दर भटकना न पैसे की जरूरत न ताकत की | सत की भक्ती के लिये कही भी जाने की जरूरत नही है किसी स्थान पर विशष महत्व नही हैा इसमे चाहिये निर्मल मन मन दृढ़ विचार और लगन | सत की भक्ती के कोई भी समय या महुरत की भी जरूरत नही है|सत की भक्ती कही भी कर सकते हो सत की भक्ती चलते फिरते उठते बैठते जैसी तुम्हारा मन करे ले सकते हो मालिक ने कितने सरल भक्ती हम साधन को दी है|
   सत अबगत सत अबगत
           सतनाम सदा सही