एक वृक्ष के नीचे कुछ व्यक्ति विश्राम कर रहे थे उनमें से एक नृत्यकार दूसरा संगीतकार तीसरा संत चौथा एक नौजवान जो अभी-अभी घर से लड़ कर आया था पांचवां एक व्यापारी था ।
कुछ ही समय बाद हवा के झोंके से डालियां व पत्ते झूमते हैं हिलोरे लेते हैं । जो नृत्यकार हैं, सोचता है मेरे से भी ज्यादा सुंदर यह वृक्ष नृत्य कर रहा है । इसकी डालियों मे कितनी लचक है । इसके पत्ते इतने सुंदर ढंग से झूम रहे हैं । उसको वृक्ष नाचता हुआ प्रतीत होता है ।
जब हवा के तेज झोंके पेड़ से स्पर्श करते हैं तब साय-साय की आवाज आती है संगीतकार सोचता है यह वृक्ष भी गा रहा है, गीत संगीत इस वृक्ष से भी निकल रहा है उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे पत्ते पत्ते से संगीत निकल रहा है ।
संत देखता है एक सूखा पत्ता हवा के झोंके से डाली से टूट कर जमीन पर आ गिरता है उसके मुख से यह शब्द निकलता है एक दिन संसार रूपी वृक्ष से ऐसे ही टूट कर मैं भी गिर जाऊंगा वह वैराग्य की दुनिया में खो गया ।
व्यापारी यह सोचता है अगर यह पेड़ मैं खरीदता हूँ तो इसमें से इमारती लकड़ी कितनी मुझे प्राप्त होगी, कितने में मैं वृक्ष खरीदूं यह सोचकर व्यापार की दुनिया मे खो जाता है ।
हवा के तेज झोंकों से जब शाखा शाखाओं से टकराती हैं पत्ते पत्तों से टकराते हैं तो वह नौजवान सोचता है शाखा शाखा से लड़ रही है । पत्ते पत्तों से लड़ रहे हैं । सिर्फ मेरे ही घर में लड़ाई नहीं है यहां वृक्ष में भी बहुत बड़ी लड़ाई चल रही है ।
जैसी जिसकी दृष्टि है मनुष्य को वैसी ही सृष्टि दिखाई देती है । वृक्ष एक है लेकिन सब के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं । इन्हीं अलग-अलग दृष्टिकोणों से ही परमात्मा के अनेक नाम रूप प्रचलित हुए । जैसा जिसने अपने दृष्टिकोण से समझा उसे वैसा नाम रुप दिया ।
आज दुनिया में सभी धर्मों वाले भगवान को अपनी अपनी रीति से मानते हैं और याद करते हैं । इसीलिए परमात्मा के बारे में अनेक मत-मतांतर है ।
अभी हमें जबकि परमात्मा ने आकर स्वयं अपना सत्य और स्पष्ट परिचय दिया है तथा सत्य ज्ञान दे रहे हैं। जिससे हम उन्हें यथार्थ जानकर अपने नजरिए से अपना और सृष्टि का परिवर्तन कर सकते है।।।