दखो, तोता अपने गुणों के कारण ही बंधन को प्राप्त होता है, बगुले को कोई नहीं बाँधता । माने गुणवान अधिक सताया जाता ही है ।
घाव पर ही चोट लगती है, अन्न न रहे तो भूख बढ़ती है, माने संकटकाल में अपने भी वैरी हो जाते हैं, विधाता के विपरीत हो जाने पर क्या नहीं सहना पड़ता ?
राम जी का वनवास, बलि का बंधन, पाण्डवों का कष्ट, यदुवंश का नाश, रावण का मरण देख कर भी क्या काल का बली होना सिद्ध नहीं होता ? माने प्रारब्ध भोगना ही पड़ेगा ।
तो बुद्धिमान साधक को अधैर्य त्याग कर, उचित समय की प्रतीक्षा करते हुए, अपमान सहते हुए भी, साधन करते रहना चाहिये ।
बताओ तो, क्या युधिष्ठिर को त्रिदण्डी सन्यासी नहीं बनना पड़ा ? भीम को रसोइया, नकुल सहदेव को दास बनना पड़ा, अर्जुन को हाथी की सूंड जैसी भुजाओं को कंगण पहनने योग्य बना कर किन्नर का रूप स्वीकार करना पड़ा, रूपवती द्रोपदी को विराट की गर्वीली रानियों के तिरस्कारपूर्ण वचन सहते हुए नाईन की तरह चन्दन घिसने वाली बनना पड़ा ।
अब जो होना है होता रहे । सुख आए, दुख आए, साधन वैसा ही चलता रहे । घबरा कर पलट मत जाना ।
चलते रहो ! चलते रहो !
मेरी शुभकामनाएँ ॥
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