*कबीर* *दास* *जी* *कहते* *हैं* कि मक्खी पहले तो गुड़ से लिपटी रहती है। अपने सारे पंख और मुंह गुड़ से चिपका लेती है लेकिन जब उड़ने प्रयास करती है तो उड़ नहीं पाती तब उसे अफ़सोस होता है। ठीक वैसे ही इंसान भी सांसारिक सुखों में लिपटा रहता है और अंत समय में में अफ़सोस होता है।
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*आज* *के* *विचार*
*कबीर* *साहिब* *कहते* *हैं* कि केवल बातें करने से कुछ प्राप्त नहीं होता। मनुष्य को अपने जीवन में सही आचरण उतारना चाहिए। जैसे केवल "पानी-पानी" कहने से प्यास नहीं बुझती, पानी पीना पड़ेगा तभी प्यास बुझेगी। वैसे ही सच्ची साधना और आचरण के बिना आत्मिक लाभ नहीं मिलता। सच्चा मार्ग करनी में है, जपने में नहीं।