मालिक से अरदास

स्वयं भाग्य के विधाता

      हर इनसान के कर्म अलग-अलग होते, इसलिए ही आज किसी एक इनसान का मन किसी दूसरे के मन के साथ नहीं मिलता, और एक इनसान मन भी हमेशा एक-सा नहीं रहता,हमारा मन हमारे किएँ हुए कर्मों के अनुसार ही संकल्प और इच्छाएँ-तृष्णाएँ पैदा करता है इसलिए जिस तरह का कर्म जिस दिन उदय होता है, तो हमारा मन और हमारी बुद्ध भी उसी के अनुसार कार्य करती है , क्योंकि यह मन पिछले कई जन्मों के कर्मों के तेज़ बहाव के समान है जो जीव को जबरदस्ती अपने साथ बहा कर ले जाता है,इस तरह एक इनसान अपने ही कर्मों के वश में आकर अच्छे और बुरे कर्म करने के लिए मजबूर हो जाता है , इसलिए आज अपनी वर्तमान हालत की लिए किसी दूसरे को दोष देना अज्ञानता है,हमारा भाग्य किसी छिप कर बैठी विरोधी शक्ती ने नहीं लिखा है, हम ही अपने भाग्य के विधाता स्वयं है.

  मालिक से अरदास

हौसला मेरा कमजोर ना होने देना "मेरे मालिक"

मुसीबत जो आये जिन्दगी मे
हिम्मत मेरी टूटने ना देना

     "या मेरे मालिक"

सिर झुके तो बस तेरे आगे
इसे झुकने नहीं देना लोगों के आगे 
ऐसा हौसला देना 

सब दर्द मिटा देते मेरे मालिक

ग़ज़ब है 
 मेरे दिल में " मेरे  मालिक का वजूद"
 मैं खुद से दूर और वो मुझ में मौजूद