एक बड़े अनुभव की बात है

एक बड़े अनुभव की बात है, ऐसी की जिस साधक के अंतःकरण में उतर जाए, उसका आधा मार्ग अभी तय करा दे। उसे अभी चिंताओं से मुक्ति मिल जाए।
विधाता माथे पर जो लेख लिख देता है, माने एकबार जैसा प्रारब्ध बन बैठता है, उसे बड़े बड़े बुद्धिमान पंडित भी अपनी बुद्धि से मेट नहीं सकते।
निर्विवाद सत्य है कि जो नहीं होना होता, वह नहीं होता। जो होना है, वह होकर ही रहता है। होना हो तो कल्पनातीत पदार्थ की भी प्राप्ति हो जाती है। न होना हो तो हाथ का पदार्थ भी नष्ट हो जाता है।
जिससे, जब, जैसा, जो, जितना, जहाँ शुभ अशुभ कर्म हुआ रहता है,
उससे, तब, तैसा, सो, उतना, वहाँ ही काल की प्रेरणा से फल प्राप्त होता है।
दैव भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता।
देखो, छाया और धूप की तरह, कर्म और कर्ता साथ रहते हैं। कर्म सोते के साथ सोता, चलतों के साथ चलता, सदा कर्ता के साथ ही रहता है। जैसे लाखों गायों के झुण्ड में भी, बछड़े अपनी अपनी माँ को ढूंढ ही लेते हैं, कर्ता लाख दरवाजे के पीछे छिपा हो, कर्म जब फल देने के लिए खड़ा होता है, उसे खोज ही लेता है।
तब सुख से सटना और दुख से हटना, दोनों ही प्रयास निष्फल रहते हैं। सुख चाहने वाला और दुख से भागने वाला, दोनों ही दुख को ही प्राप्त होते हैं। सुख की आशा से जो धनादि में आसक्त रहते हैं, वे मूर्ख मानो गर्मी से तप्त होकर, ठंडक पाने के लिए, अग्नि का सेवन करते हैं।
जबकि गजब रहस्य यह है कि सुख चाहा ही न जाए तो दुख होता नहीं, और दुख को स्वीकार कर लिया जाए, तो वह दुख दुख रहता नहीं। इसी कारण न मैं सोच करता, न ही मुझे विस्मय या भय ही होता।
"यद्धात्रा निज भालपट्ट लिखितम्,
स्तोकं वा महत् धनम्।
कूपे पश्ये पयो निधोआ,
घटम् ग्रहणात् तुल्यम् जलम्॥"
अब विडियो देखें- ममता ही दुख है