साध सँगत के विचारार्थ

साध सँगत के विचारार्थ

" सत्त अवगत " महापाठ है। जाप केलिए ही।
है कि नही ?? पूरे निर्वाण ज्ञान में चाहे अश्लोक हो , कड़ा हो कहीँ भी किसी लाइन में जाप के नाम का  जिक्र नही है।

जाप की महिमा शुरू के सारांश में वर्णित है।

लेत सत्तनाम के सदा होई चांदना। यहाँ और कई जगह सत्तनाम शब्द आया है। जाप तो सत्त अवगत का करते है जो उदादास बाबा का बताया हुआ महापाठ है और इस नाम का जिक्र दूसरी जगह नही किया जा सकता अतः उसकी जगह सत्तनाम लिखा जाता है।

इसीलिए सत्तनाम और सत्त अवगत पर्यावाची अर्थात मालिक ही है।

ऐसे साध जो सत्त अवगत का जाप करे , भक्ति करे उनको सत्तनामी साध कहते है।

अब साध देहधारी को सत्तनाम कहेगा तो उसे सत्त अवगत कहा एक ही बात है।

क्या ये गलती पाप नही की इंसान को सत्तनाम कहकर बाबाजी का दर्जा देदिया।

साध को आराम सुख की और या बड़ा हो तो सिक्का सामिली करनी चाहिए। यही अव्वल फरी में चलन है।

दोयम फरी ने सिक्के की काट करने केलिए सत्तनाम कहना, परसाद को नही मानना, भण्डारे को नही मानते बल्कि देखा देखी में करते है। पूनो करते है पर मानते नही।

सत्तनाम कहने की प्रथा उन्होंने चलाई। अव्वल फरी ने इसकी चालाकी पर ध्यान नही दिया।

अब राजस्थान की सँगत विचार करे और सत्तनाम का सम्बोधन एक दूसरे से कर पाप् में भागीदार बनने से बचे।

इस " सत्तनाम " कहकर सम्बोधन करने वालो को एक ही जवाब है " सतगुर से "

इस जवाब की आदत डाल लो फिर वो भविष्य में सत्तनाम कहना बन्द कर देगा। तुम ऐसो को देखते ही अराम सुख की कहो। वो जवाब नही देगा अक्सर।

ध्रुव साध