आज़ादी मुबारक हो

*एक फ़क़ीर से जब मैंने कहा आज़ादी मुबारक हो*
*फ़क़ीर ज़ोर ज़ोर से हसने लगा और कहने लगा कि -*
*सांसारिक तौर पर कहूँ तो ये बाहरी आज़ादी मुबारक हो, लेकिन अगर सिर्फ तुझे देख कर कहूँ तो तुम आज़ाद हुए कब हो*

*तुम गुलाम, तुम्हारी रूह कैद और गुलाम तो सिर्फ गुलामी ही कर सकता है जो तुम बखूबी कर भी रहे हो  फिर तुझे कैसे कहूँ कि आज़ादी मुबारक हो*

*तुम सन्तोष तो चाहते हो लेकिन मन का आदेश तुम्हे बिना रुके सिर्फ दौड़ाया जा रहा है और तुम दौड़ते जा रहे हो.*
*फिर तुम आज़ाद कैसे*

*तुम शांति तो चाहते लेकिन, मन का हुकुम तुझे दंगो फसादों, निंदा और चुगली में उलझाया जा रहा है*
*फिर तुम आज़ाद कैसे*

*तुम सत्मार्ग तो चाहते हो, लेकिन मन के कहे तुम कुमार्ग पर चलने को लाचार और विवश हो*
*फिर तुम आज़ाद कैसे*

*तुम तो परमात्मा से मिलाप भी चाहते हो लेकिन मन के हुकुम के चलते तुम खुद को दुनियाँ के रंग तमाशों में गुमराह किये जा रहे हो*
*फिर तुम आज़ाद कैसे*

*तुम मालिक की भजन बन्दगी भी करना चहते हो लेकिन मन ने तुझे कहा - ये सब मुझे नही भाता,  छोड़ ये सब और तूने छोड़ भी दिया*
*फिर तुम आज़ाद कैसे*

*तुम रूह को ऊपर उठाने की कोशिश करना चाहते हो, लेकिन मन तुझसे बाहरी कर्मकाण्ड करवा कर तुम्हारी कोशिश को दबा देता है*
*फिर तुम आज़ाद कैसे*

*तुम जाना कहीं और चाहते हो लेकिन मन अपने आदेश से तुम्हे ले कहीं और जाता है। तुम तो एक गुलाम ही हुए ना*
*फिर तुम आज़ाद कैसे*

*फिर आखरी में उस फकीर ने कहा जिस दिन तुम मन की गुलामी से आज़ाद हो कर रूह  को मन की ज़ंजीरों से रिहा कर लोगे*

*उस दिन ये फ़क़ीर तुझे सच्चे दिल से कहेगा कि ऐ प्यारे तुझे  आज़ादी मुबारक हो*