मिली हैं रूहें तो, रस्मों की बंदिशें क्या हैं

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*मिली हैं रूहें तो, रस्मों की बंदिशें क्या हैं,*
*यह जिस्म तो ख़ाक हो जाना है फिर रंजिशें क्या हैं,*
*है छोटी सी ज़िन्दगी, फिर तकरारें किस लिए,*
*रहो एक दूसरे के दिलों में यह दीवारें किस लिए,*

*खुशी के फूल उन्हीं के दिलों में खिलते हैं,*
*जो आदमी की तरह आदमी से मिलते हैं,*