मैँ साधारण आदमी हूँ और मैँ तुम्हेँ

ओशो ..........  मैँ  साधारण  आदमी  हूँ  और  मैँ  तुम्हेँ  साधारण  ही  बना  सकता  हूँ ।  मैँ  बस  तुम्हारे  जैसा  हूँ ।  फर्क  अगर  कुछ  होगा  तो  इतना  ही  है  कि  मैँ  परम  तृप्त  हूँ ।  मैँ  राजी  हूँ ।  मैँ  अहोभाग्य  से  भरा  हूँ ; जैसा  है  सुन्दर  है , सत्य  है ।  जो  भी  हो  रहा  है ,  उससे  इंच  भर  भिन्न  करने  की  कोई  आकांक्षा  नहीँ  है ,  कोई  योजना  नहीँ  है ।  मेरे  पास  कर्ता  का  भाव  ही  नहीँ  है ।  देखता  हूँ । जो  दृश्य  परमात्मा  देता  है , वही  देखता  हूँ ।  अगर  तुम  भी  द्रष्टा  होने  को  राजी  हो  और  कर्ता  का  पागलपन  तुम्हारा  छूट  गया  है ,  तो  ही  मेरे  पास  तुम्हारे  जीवन  मेँ  कोई  सुगंध , कोई  अनुभूति  का  प्रकाश  फैलना  शुरू  होगा ।  अन्यथा  तुम  मुझे  न  समझ  पाओगे ।  मैँ  तो  आलसी  शिरोमणि  हूँ ;  तुम्हेँ  भी  वहीँ  ले  चलना  चाहता  हूँ  जहाँ  कर्तापन  न  रह  जाये ;  जहाँ  प्रभु  जो  कराये  तुम  करो ,  जो  बुलवाये  बोलो ,  जो  न  करवाये  न  करो ;  जहाँ  तुम  बीच - बीच  मेँ  आओ  ही  न ;  जहाँ  तुम  मार्ग  से  बिल्कुल  हट  जाओ ।

मैँ  बिल्कुल  मार्ग  से  हट  गया  हूँ ;  जो  होता  है  होता  है ।  ऐसा  ही  तुम्हारे  भीतर  भी  हो  जाये ,  ऐसे  आधार - मानुष  को  पुकारा  है  मैनेँ ;  ऐसे  सहज  मनुष्य  को  पुकार  दी  है ।  अपने  हृदय  को  खोल  कर  रख  दो ,  सहज ,  जैसे  हो ।  और  तब  तुम्हारे  भीतर  सहज  मानव  पैदा  होगा , आधार- मनुष्य , सहज  मनुष्य । उस  सहज  की  तलाश  हो  रही  है ।  साधो , सहज  समाधि  भली !

सन्यास  यानी  सहज  होने  की  प्रकिया ।  और  सहज  होने  की  प्रकिया  का  आधार  भाव  यही  है  कि  मुक्त  तुम  हो ,  इसलिए  कुछ  और  होना  नहीँ  है ।  अपनी  सहजता  मेँ  डूब  गये  कि  मुक्त  हो  गये !!!ॐ!!!