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P शब्द इंसान को बहुत प्रिय है

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*'P' शब्द इन्सान को बहुत प्रिय है  हम जिंदगी भर P के पीछे भागते रहते है ।*

*जो मिलता है वह भी P से..*
*और जो नहीं मिलता वह भी P से...*

              *P  👨  पति*
              *P  👩  पत्नि*
              *P  👦  पुत्र*
              *P  👧  पुत्री*
              *P  👪  परिवार*
              *P  💞प्रेम*
              *P  💵  पैसा*
              *P 💺  पद*
              *P 🚨 प्रतिष्ठा*
              *P 👏 प्रशंसा*
              *P 👨‍❤‍💋‍👨 प्यार*
              *P 🍻 पार्टी*
              *P 📋परीक्षा*
              *P 🏅पब्लिसिटी*
             
*इन सब P के पीछे पड़ते-पड़ते हम P से पाप भी करते है ।*
*फिर हमारा P से पतन होता है..*

*और अंत मे बचता है सिर्फ P से पछतावा...*

*पाप के P के पीछे पड़ने से अच्छा है हम P से परमात्मा के पीछे पड़े... और P से पुण्य कमाये..*

           *अतं मे P से प्रणाम🙏🙏🙏🙏🙏🙏
                  🙏🙏🙏

‘सब्र’ और ‘सच्चाई’ एक ऐसी सवारी है

‘सब्र’ और ‘सच्चाई’ ,विस्वास एक ऐसी सवारी है…..जो अपने सवार को कभी गिरने नहीं देती….. ना किसी के कदमो में…और ना किसी की नज़रों में..!!
                                                                 

संसार में मनुष्य जन्म बार बार नही मिलता


दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ : इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है. यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं
लगता.

मृत्युभोज से ऊर्जा नस्ट होती है

👌🏻मृत्युभोज
से ऊर्जा नष्ट होती है
महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि .....
मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
जिस परिवार में मृत्यु जैसी विपदा आई हो उसके साथ इस संकट की घड़ी में जरूर खडे़ हों
और तन, मन, धन से सहयोग करें
लेकिन......बारहवीं या तेरहवीं पर मृतक भोज का पुरजोर बहिष्कार करें।
महाभारत का युद्ध होने को था,
अतः श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जा कर युद्ध न करने के लिए संधि करने का आग्रह किया ।
दुर्योधन द्वारा आग्रह ठुकराए जाने पर श्री कृष्ण को कष्ट हुआ और वह चल पड़े,
तो दुर्योधन द्वारा श्री कृष्ण से भोजन करने के आग्रह पर कृष्ण ने कहा कि
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’’सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’’
अर्थात्
"जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो,
तभी भोजन करना चाहिए।
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लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वालों के दिल में दर्द हो, वेदना हो,
तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।"
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हिन्दू धर्म में मुख्य 16 संस्कार बनाए गए है,
जिसमें प्रथम संस्कार गर्भाधान एवं अन्तिम तथा 16वाँ संस्कार अन्त्येष्टि है।
इस प्रकार जब सत्रहवाँ संस्कार बनाया ही नहीं गया
तो सत्रहवाँ संस्कार
'तेरहवीं का भोज'
कहाँ से आ टपका।
किसी भी धर्म ग्रन्थ में मृत्युभोज का विधान नहीं है।
बल्कि महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
लेकिन हमारे समाज का तो ईश्वर ही मालिक है।

जिस भोजन बनाने का कृत्य....
रो रोकर हो रहा हो....
जैसे लकड़ी फाड़ी जाती तो रोकर....
आटा गूँथा जाता तो रोकर....
एवं पूड़ी बनाई जाती है तो रो रोकर....
यानि हर कृत्य आँसुओं से भीगा हुआ।
ऐसे आँसुओं से भीगे निकृष्ट भोजन
अर्थात बारहवीं एवं तेरहवीं के भोज का पूर्ण रूपेण बहिष्कार कर समाज को एक सही दिशा दें।
जानवरों से भी सीखें,
जिसका साथी बिछुड़ जाने पर वह उस दिन चारा नहीं खाता है।
जबकि 84 लाख योनियों में श्रेष्ठ मानव,
जवान आदमी की मृत्यु पर
हलुवा पूड़ी पकवान खाकर शोक मनाने का ढ़ोंग रचता है।
इससे बढ़कर निन्दनीय कोई दूसरा कृत्य हो नहीं सकता।
यदि आप इस बात से
सहमत हों, तो
आप आज से संकल्प लें कि आप किसी के मृत्यु भोज को ग्रहण नहीं करेंगे और मृत्युभोज प्रथा को रोकने का हर संभव प्रयास करेंगे
हमारे इस प्रयास से यह कुप्रथा धीरे धीरे एक दिन अवश्य ही पूर्णत: बंद हो जायेगी
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ग्रुप के सभी सम्मानित सदस्यों से परम आग्रह है कि
इस पोस्ट को अधिक से अधिक ग्रुप में शेयर करें।
मृत्युभोज समाज में फैली कुरीति है व समाज के लिये अभिशाप है ।
🙏 मानव समाज हित में 🙏