दुख है मांग और चाह का होना सुख है अचाह होना

दुख और सुख

दुख है मांग और चाह का होना
सुख है अचाह होना

दुख है अभाव की ओर ध्यान देना और यही सोचना कि मेरे पास क्या नहीं है जो दूसरों के पास है
सुख है भाव की ओर ध्यान देना और यही सोंचना कि मेरे पास क्या है और मैं उसमें कितना त्रप्त हूँ

दुख है कमी ढूँढना
सुख है स्वीकार्यता

दुख है ईर्ष्या और मान की चाहना
सुख है सुमलत, कि जो मिला है वह बहुत है

दुख है शिकायत
सुख है धन्यवाद

दुख है लालसा
सुख है संतोष

दुख है लोभ
सुख है दान

दुख है पराए की चाह
सुख है शील

दुख है बेचैनी
सुख है शांती

दुख है बेईमानी
सुख है ईमानदारी

दुख है अहंकार
सुख है समर्पण

दुख है 'मैं'
सुख है 'वो'

दुख है क्रोध
सुख है करुणा

दुख है बदला
सुख है क्षमा

दुख है अपने नाम की आस
सुख है सत्तनाम की आस

दुख है व्यभिचार
सुख है सदाचार

दुख है विस्मरण (बिसरना)
सुख है स्मरण (सुमरन)

दुख है कि मुझे मिल जाए सब
सुख है तेरा तुझको सौंप दिया सब

दुख है पकडना
सुख है छोड देना

दुख है सिर्फ अपने लिए मांगना
सुख है सिर्फ सबके लिए मांगना

'मेरा' का भाव दुख है,
एक सराय (शरीर) में रात (जीवन) व्यतीत करने पर उस सराय को अपना मान लेना और सदा उसमें रहने की चाहना दुख है
उसी सराय को समय पर छोडने के लिए तत्पर रहने का भाव सुख है

मालिक सबको भलो करियौ

बहुत सुँदर पंक्तियाँ- "संयुक्त परिवार

बहुत सुँदर पंक्तियाँ- "संयुक्त परिवार"

वो पंगत में बैठ के
निवालों का तोड़ना,
वो अपनों की संगत में
रिश्तों का जोडना,

वो दादा की लाठी पकड़
गलियों में घूमना,
वो दादी का बलैया लेना
और माथे को चूमना,

सोते वक्त दादी पुराने
किस्से कहानी कहती थीं,
आंख खुलते ही माँ की
आरती सुनाई देती थी,

इंसान खुद से दूर
अब होता जा रहा है,
वो संयुक्त परिवार का दौर
अब खोता जा रहा है।

माली अपने हाथ से
हर बीज बोता था,
घर ही अपने आप में
पाठशाला होता था,

संस्कार और संस्कृति
रग रग में बसते थे,
उस दौर में हम
मुस्कुराते नहीं
खुल कर हंसते थे।

मनोरंजन के कई साधन
आज हमारे पास है,
पर ये निर्जीव है
इनमें नहीं साँस है,

आज गरमी में एसी
और जाड़े में हीटर है,
और रिश्तों को
मापने के लिये
स्वार्थ का मीटर है।

वो समृद्ध नहीं थे फिर भी
दस दस को पालते थे,
खुद ठिठुरते रहते और
कम्बल बच्चों पर डालते थे।

मंदिर में हाथ जोड़ तो
रोज सर झुकाते हैं,
पर माता-पिता के धोक खाने
होली दीवाली जाते हैं।

मैं आज की युवा पीढी को
इक बात बताना चाहूँगा,
उनके अंत:मन में एक
दीप जलाना चाहूँगा

ईश्वर ने जिसे जोड़ा है
उसे तोड़ना ठीक नहीं,
ये रिश्ते हमारी जागीर हैं
ये कोई भीख नहीं।

अपनों के बीच की दूरी
अब सारी मिटा लो,
रिश्तों की दरार अब भर लो
उन्हें फिर से गले लगा लो।

अपने आप से
सारी उम्र नज़रें चुराओगे,
अपनों के ना हुए तो
किसी के ना हो पाओगे
सब कुछ भले ही मिल जाए
पर अपना अस्तित्व गँवाओगे

बुजुर्गों की छत्र छाया में ही
महफूज रह पाओगे।
होली बेमानी होगी
दीपावली झूठी होगी,
अगर पिता दुखी होगा
और माँ रूठी होगी।।

अन्तःकरण को छूने वाली है ये कविता जिसने भी लिखी है उसको प्रणाम। आगे भेज सकें तो महरवानी होगी।

गंगा में डुबकी लगाकर,तीर्थ किए हज़ार। इनसे क्या होगा,अगर बदले नहीँ विचार।



���� गंगा में डुबकी लगाकर,तीर्थ किए हज़ार।
इनसे क्या होगा,अगर बदले नहीँ विचार।


���� "इस दुनियाँ के हर शख्स को नफरत है "झूठ" से...

मैं परेशान हूँ ये सोचकर, कि फिर ये "झूठ" बोलता कौन है"।


���� "निंदा "तो उसी की होती है
जो"जिंदा" है।
मरे हुए कि तो बस तारीफ ही होती हैं।


���� महसूस जब हुआ कि सारा शहर,
मुझसे जलने लगा है,
तब समझ आ गया कि अपना नाम भी,
चलने लगा है”…


���� सदा उनके कर्जदार रहिये जो आपके लिए कभी खुद का वक्त नहीं देखता है,
और
सदा उनसे वफ़ादार रहिये जो व्यस्त होने के बावजूद भी आपके लिए वक़्त निकालता है।


���� मोक्ष  का  एक  ही  मार्ग  है।
         और  वह  बिल्कुल  सीधा  ही  है।
            अब  मुशकिल   उन्हें  होती  है।
       जिनकी  चाल  ही  टेड़ी  है।


���� हम जब दिन की शुरुआत करते है,
तब लगता है की, पैसा ही जीवन है ..
 लेकिन, जब शाम को लौट कर घर आते है,
तब लगता है, शान्ति ही जीवन है ।


���� फलदार पेड़ और गुणवान व्यक्ति ही झुकते है ,
सुखा पेड़ और मुर्ख व्यक्ति कभी नहीं झुकते ।
कदर किरदार की होती है… वरना…
कद में तो साया भी इंसान से बड़ा होता है.......


���� पानी मर्यादा तोड़े तो  "विनाश"
                          "और"
         वाणी मर्यादा तोड़े तो "सर्वनाश"

इसलिए हमेशा अपनी वाणी पर संयम रखो

जीवन में सारा कुछ, हमारी सोंच पर आधारित है

जीवन में सारा कुछ, हमारी सोंच पर आधारित है।
 हमारी अच्छाई, सच्चाई, द्रढता और मजबूती।
हमारी हटधर्मिता, हमारा पलायन, हमारा बुराईयों से जुडाव।
हमारी आशा, हमारी निराशा, हमारा दुख, हमारा सुख।
 हमारी कलह, हमारी वेचैनी, हमारी हार, हमारी जीत।
 हमारी चिन्ता, हमारी वेख्याली।
 हमारी शान्ती, हमारी अशान्ति।
सभी हमारी सोंच का दर्पण हैं।
एक अच्छी, सच्ची ग्यान जोग द्रण सोंच, हमें मालिक के दरवार में पहुचा सकती है।
वहीं बुरे विचारों से ओतप्रोत मलिन सोंच, हमें चौरासी का रसास्वादन करा सकती है।
आशा और निराशा जीवन की दो धारायें है।
निराशावादी मनुष्य हमेंशां,परेशान ही रहता है।
जबकि एक आशावादी, कठिन, से कठिन समय में भी, विचलित नहीं होता।
कैसी भी विकट परिस्थिती क्यों न हो, उसे विस्वास होता है कि, सब कुछ सही ही होगा।
"आशा एक उसैदी"।
साध का काम है कि, वह ग्यान जोग सोंच रख्खे, मालिक से आश करे, उसके सारे काम पूरे होंगे।
सत्तनाम।
राजमुकट साध

बात पूरे की करो अधूरे में क्या रखा है

बात पूरे की करो
अधूरे में क्या रखा है

बात दान की करो
लोभ में क्या रखा है

बात क्षमा की करो
बदले में क्या रखा है

बात एकांत की करो
भीड में क्या रखा है

बात भक्ति की करो
संसार में क्या रखा है

बात ह्रदय की करो
बुद्धि में क्या रखा है

बात समर्पण की करो
अहंकार में क्या रखा है

बात सत्त की करो
झूठ में क्या रखा है

बात गरीबत की करो
दिखावे में क्या रखा है

बात प्रेम की करो
द्वेष में क्या रखा है

बात सत्तनाम की करो
सांसारिक नाम में क्या रखा है

बात संतोष की करो
लालसा में क्या रखा है

बात धीरज की करो
बेचैनी में क्या रखा है

बात गुरू की करो
चापलूसी में क्या रखा है

बात शील की करो
पराए में क्या रखा है

बात भलाई की करो
बुराई में क्या रखा है

बात ज्ञान की करो
अज्ञान में क्या रखा है

बात मीठी करो
कडवे में क्या रखा है

बात शून्य की करो
शोर में क्या रखा है

मालिक सबको भलो करियौ

मनुष्य भी कया कमाल का प्राणी है

मनुष्य भी कया कमाल का प्राणी है ?
�� प्रार्थना करते समय समझता है कि भगवान सब सुन रहा है,
      पर निंदा करते हुए ये भूल जाता है।
�� पुण्य करते समय यह समझता है कि भगवान देख रहा है,
     पर पाप करते समय ये भूल जाता है।
�� दान करते हुए यह समझता है कि भगवान सब में बसता है,
     पर चोरी करते हुए ये भूल जाता है।
�� प्रेम करते हुए यह समझता है कि पूरी दुनिया भगवान ने बनाई है,
         पर नफरत करते हुए ये भूल जाता है।
      ��..और हम कहते हैं कि मनुष्य सबसे बुद्धिमान प्राणी है।
��    क़दर किरदार की होती है, वरना...कद में तो साया भी इंसान से बड़ा होता है......
             ♥��♥��♥��♥

मंदिर भी क्या गज़ब की जगह है...

गरीब बाहर भीख मांगते हैं और अमीर अन्दर..................