आंसू जता देते है दर्द कैसा है।

*आंसू जता देते है दर्द कैसा है।*
*बेरूखी बता देती है हमदर्द कैसा है ॥*

*घमण्ड बता देता है कितना पैसा है ।*
*संस्कार बता देते है परिवार कैसा है ॥*

*बोली बता देती है  इंसान कैसा है  ।*
*बहस बता  देती है  ज्ञान कैसा है।*

*नजरें बता देती है  सूरत कैसी है ।*
*स्पर्श बता देता है  नीयत कैसी है ॥*

  *💐आप का दिन शुभ हो💐*
   *🌹सदा मुस्कुराते रहिये🌹*
           *🌴सुप्रभात🌴*

ज़िन्दगी एक सफ़र है,आराम से चलते रहो

_एक ट्रक के पीछे एक_
_बड़ी अच्छी बात लिखी देखी...._

_"ज़िन्दगी एक सफ़र है,आराम से चलते रहो_
_उतार-चढ़ाव तो आते रहेंगें, बस गियर बदलते रहो"_
_"सफर का मजा लेना हो तो साथ में सामान कम रखिए_
_और_
_जिंदगी का मजा लेना हैं तो दिल में अरमान कम रखिए !!_

_तज़ुर्बा है हमारा... . .. _मिट्टी की पकड़ मजबुत होती है,_
_संगमरमर पर तो हमने .....पाँव फिसलते देखे हैं...!_

👌👌👌👌😇😇

_जिंदगी को इतना सिरियस लेने की जरूरत नही यारों,_

_यहाँ से जिन्दा बचकर कोई नही जायेगा!_

_जिनके पास सिर्फ सिक्के थे वो मज़े से भीगते रहे बारिश में ...._

_जिनके जेब में नोट थे वो छत तलाशते रह गए..._

👌👌👌👌👌👌👌

_पैसा इन्सान को ऊपर ले जा सकता है;_
            
_लेकिन इन्सान पैसा ऊपर नही ले जा सकता......_

👌👌👌👌👌👌👌👌

_कमाई छोटी या बड़ी हो सकती है...._

_पर रोटी की साईज़ लगभग  सब घर में एक जैसी ही होती है।_

  _:👌 शानदार बात👌_

_इन्सान की चाहत है कि उड़ने को पर मिले,_

_और परिंदे सोचते हैं कि रहने को घर मिले..._
                   
‬👌👌👌👌👌😇😇

_कर्मो' से ही पहचान होती है इंसानो की..._

_महेंगे 'कपडे' तो,'पुतले' भी पहनते है दुकानों में !!.._

😎😎😇😇😇
```मुझे नही पता कि मैं एक बेहतरीन ईसान हूँ या नही...```
_लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि_
_मैं जिस को भी ये भेज रहा  हूँ वो बहुत_
_बहुत बेहतरीन है✍👏
अच्छा लगा तौ शैयर अवश्य करै🙏

Lukmaan story

लुकमान की एक छोटी कहानी है। और लुकमान ने कहानियों में ही अपना संदेश दिया है। ईसप की प्रसिद्ध कहानियां आधे से ज्यादा लुकमान की ही कहानियां हैं, जिन्हें ईसप ने फिर से प्रस्तुत किया है। लुकमान कहता है, एक मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। मक्खी बहुत भिनभिनाई, आवाज की, और कहा, ‘भाई!’ मक्खी का मन होता है हाथी को भाई कहने का। कहा, ‘भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हट जाऊंगी।’ लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर हाथी एक पुल पर से गुजरता था बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गङ्ढ था, मक्खी ने कहा कि ‘देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी।’ हाथी के कान में थोड़ी-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। फिर मक्खी के बिदा होने का वक्त आ गया। उसने कहा, ‘यात्रा बड़ी सुखद हुई। तीर्थयात्रा थी, साथी-संगी रहे, मित्रता बनी, अब मैं जाती हूं। कोई काम हो, तो मुझे कहना।’
तब मक्खी की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी। उसने कहा, ‘तू कौन है कुछ पता नहीं। कब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ गयी, इसका कोई हिसाब नहीं है। लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी।

लुकमान कहता है, ‘हमारा होना भी ऐसा ही है। इस बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। इस बड़े अस्तित्व में हाथी और मक्खी के अनुपात से भी हमारा अनुपात छोटा है। क्या भेद पड़ता है? लेकिन हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं। हम बड़ा शोरगुल मचाते हैं! वह शोरगुल किसलिये है? वह मक्खी क्या चाहती थी? वह चाहती थी हाथी स्वीकार करे, तू भी है; तेरा भी अस्तित्व है।

हमारा अहंकार अकेले तो नहीं जी सक रहा है। दूसरे उसे मानें, तो ही जी सकता है। इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें; उपेक्षा न हो। हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों के लिये, स्नान करते हैं तो दूसरों के लिये, सजाते-संवारते हैं तो दूसरों के लिये। धन इकट्ठा करते, मकान बनाते, तो दूसरों के लिये। दूसरे देखें और स्वीकार करें कि तुम कुछ विशिष्ट हो। तुम कोई साधारण नहीं। तुम कोई मिट्टी से बने पुतले नहीं हो। तुम कोई मिट्टी से आये और मिट्टी में नहीं चले जाओगे, तुम विशिष्ट हो। तुम्हारी गरिमा अनूठी है। तुम अद्वितीय हो। अहंकार सदा इस तलाश में है-

वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दें।

ओशो💞💞💞

बुद्ध के पास मौलुंकपुत्त नाम का एक

*💫बुद्ध के पास मौलुंकपुत्त नाम का एक दार्शनिक आया।💫*
उसने कहा : ईश्वर है ? बुद्ध ने कहा : सच में ही तू जानना चाहता है या यूं ही एक बौद्धिक खुजलाहट ?

मौलुंकपुत्त को चोट लगी। उसने कहा : सच में ही जानना चाहता हूं। यह भी आपने क्या बात कही! हजारों मील से यात्रा करके कोई बौद्धिक खुजलाहट के लिए आता है ?

फिर बुद्ध ने कहा : तो फिर दांव पर लगाने की तैयारी है कुछ ?
मौलुंकपुत्त को और चोट लगी, क्षत्रिय था। उसने कहा :  सब लगाऊंगा दांव पर। हालांकि यह सोचकर नहीं आया था।
पूछा उसने बहुतों से था कि ईश्वर है और बड़े वाद - विवाद में पड़ गया था। मगर यह आदमी कुछ अजीब है, यह ईश्वर की तो बात ही नहीं कर रहा है, ये दूसरी ही बातें छेड़ दीं कि दांव पर लगाने की कुछ हिम्मत है। मौलुंकपुत्त ने कहा : सब लगाऊंगा दांव पर, जैसे आप क्षत्रिय पुत्र हैं, मैं भी क्षत्रिय पुत्र हूं, मुझे चुनौती न दें।

बुद्ध ने कहा : चुनौती देना ही मेरा काम है। तो फिर तू इतना कर - दो साल चुप मेरे पास बैठ। दो साल बोलना ही मत -
कोई प्रश्न इत्यादि नहीं, कोई जिज्ञासा वगैरह नहीं। दो साल जब पूरे हो जाएं तेरी चुप्पी के तो मैं खुद ही तुझसे पूछूंगा कि मौलुंकपुत्त, पूछ ले जो पूछना है। फिर पूछना, फिर मैं तुझे जवाब दूंगा। यह शर्त पूरी करने को तैयार है ?

मौलुंकपुत्त थोड़ा तो डरा क्योंकि क्षत्रिय जान दे दे यह तो आसान मगर दो साल चुप बैठा रहे…..! कई बार जान देना बड़ा आसान होता है, छोटी - छोटी चीजें असली कठिनाई की हो जाती हैं।

लेकिन दो साल चुप बैठे रहना बिना जिज्ञासा, बिना प्रश्न,
बोलना ही नहीं, शब्द का उपयोग ही नहीं करना -- यह ज़रा लंबी बात थी मगर फंस गया था। कह चुका था कि सब लगा दूंगा तो अब मुकर नहीं सकता था, भाग नहीं सकता था।
स्वीकार कर लिया, दो साल बुद्ध के पास चुप बैठा रहा।

जैसे ही राजी हुआ वैसे ही दूसरे वृक्ष के नीचे बैठा हुआ एक भिक्षु जोर से हंसने लगा। मौलुंकपुत्त ने पूछा : आप क्यों हंसते हैं ?

उसने कहा :
मैं इसलिए हंसता हूं कि तू भी फंसा, ऐसे ही मैं फंसा था।
मैं भी ऐसा ही प्रश्न पूछने आया था कि ईश्वर है और इन सज्जन ने कहा कि दो साल चुप। दो साल चुप रहा, फिर पूछने को कुछ न बचा। तो तुझे पूछना हो तो अभी पूछ ले। देख,  तुझे चेतावनी देता हूं, पूछना हो अभी पूछ ले, दो साल बाद नहीं पूछ सकेगा।

बुद्ध ने कहा : मैं अपने वायदे पर तय रहूंगा, पूछेगा तो जवाब दूंगा। अपनी तरफ से भी पूछ लूंगा तुझसे कि बोल पूछना है ? तू ही न पूछे, तू ही मुकर जाए अपने प्रश्न से तो मैं उत्तर किसको दूंगा ?

दो साल बीते और बुद्ध नहीं भूले।
दो साल बीतने पर बुद्ध ने पूछा
कि मौलुंकपुत्त अब खड़ा हो जा,

पूछ ले।

मौलुंकपुत्त हंसने लगा।
उसने कहा :
उस भिक्षु ने ठीक ही कहा था।
दो साल चुप रहते - रहते
चुप्पी में ऐसी गहराई आई;

चुप रहते - रहते ऐसा बोध जमा,
चुप रहते - रहते ऐसा ध्यान उमगा;
चुप रहते - रहते विचार धीरे—धीरे खो गए;
फिर सुनाई ही नहीं पड़ते थे,
फिर वर्तमान में डुबकी लग
गई और जो जाना…..

बस आपके चरण धन्यवाद
में छूना चाहता हूं। उत्तर मिल गया है,
प्रश्न पूछना नहीं है।

परम ज्ञानियों ने ऐसे उत्तर दिए हैं --
प्रश्न नहीं पूछे गए उत्तर मिल गए हैं।
प्रश्नों से उत्तर मिलते ही नहीं --
शून्य से मिलता है उत्तर।
और जो उत्तर मिलता है
वही परमात्मा है
🌹🌹🌹🔥🔥🔥✍
       गुरु प्रताप साध की संगति, प्रवचन
ओशो

भीतर के "मैं" का मिटना जरूरी है।

```⛳ *"ॐ"* ⛳

भीतर के "मैं" का मिटना जरूरी है।

सुकरात समुन्द्र तट पर टहल रहे थे। उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी। वो उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा - "तुम क्यों रो रहे हो ?"

लड़के ने कहा - "ये जो मेरे हाथ में प्याला है मैं उसमें इस समुन्द्र को भरना चाहता हूँ। पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।"

बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं रोने लगे।

अब पूछने की बारी बच्चे की थी। बच्चा कहने लगा - आप भी मेरी तरह रोने लगे पर आपका प्याला कहाँ है ?

सुकरात ने जवाब दिया - बालक, तुम छोटे से प्याले में समुन्द्र भरना चाहते हो, और मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में सारे संसार की जानकारी भरना चाहता हूँ।

आज तुमने सिखा दिया कि समुन्द्र प्याले में नहीं समा सकता। मैं व्यर्थ ही बेचैन रहा।

यह सुनके बच्चे ने प्याले को दूर समुन्द्र में फेंक दिया और बोला - "सागर अगर तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता तो मेरा प्याला तो तुम्हारे में समा ही सकता है।"

इतना सुनना था कि सुकरात बच्चे के पैरों में गिर पड़े और बोले - बहुत कीमती सूत्र हाथ  लगा है।

हे परमात्मा ! आप तो सारा का सारा मुझमें नहीं समा सकते, पर मैं तो सारा का सारा आपमें लीन हो ही सकता हूँ।

ईश्वर की खोज में भटकते सुकरात को ज्ञान देना था, तो भगवान् उस बालक में समा गये थे।

सुकरात का सारा अभिमान ध्वस्त कराया। जिस सुकरात से मिलने के लिए सम्राट समय लेते थे वह सुकरात एक बच्चे के चरणों में लोट गये थे।

ईश्वर जब आपको अपनी शरण में लेते हैं तब आपके अंदर का "मैं" सबसे पहले मिटाते हैं।

या यूँ कहें कि जब आपके अंदर का "मैं" मिटता है तभी ईश्वर की कृपा होती है।

🙏🕉🙏```