हम एक सोचने की मशीन है जो कि मालिक ने ही बनायी है

 हम एक सोचने की मशीन है जो कि मालिक ने ही बनायी है ।सोच से बिचार पैदा होते है बिचार बनते है हमारे करम से बिचार आते है जाते है बिचारो की श्रृंखला समाप्त नही होती बिचार negative आते है Postive भी आते है दया मयी भी आते है करुण मयी भी आते है क्रोध और इर्ष्या के भी आते है उन बिचारो से हमारा जुड़ाव यदि हो जाता है तो हमारे भाव भी बैसे बनने शुरू हो जाते है यह हमारा बिबेक है कि हम किन बिचारो के साथ जुड़ते है और किन बिचारो को पकड़ते है ब छोड़ देते है ।

Example किसी खेत मे बीज डालना यह हमारा भाव हुआ हमने बीज डाला सफ़ाई की पानी दिया बह हमारा करम हुआ जब उस पौधे से पैदावार का स्रोत शुरू हुआ बह हमारे बिचार या सोच हुयी ।

भाव मे परिवर्तन होता है संग से इसलिए सत्संग ब
साघ संगत बहुत ज़रूरी बताई है संतो ने .... यदि यह तक कह दिया ....सत्त रा शब्द पाया सगंत माहि
और गत्त है साध सगंत सै ।
साध संगत ऐसी सुखदायी ।
जाकै मिलै कुमत मिट जाईं ।।

हमारे भाव मालिक से मिलने के है और हमने उपाय किया मालिकलदाता के हुक्म को उठाया तो मालिक हमारी सोंच /बिचारो का परिवर्तन कर देते है और मालिक से जुड़ जाने पर बह हमे अपनी समर्पित होने ब दासता से ओतप्रोत बिचार देने लगते है ।
मालिक शबद स्वरूपी है बह शब्द ब शब्द का ज्ञान देते है और अपनी बनायी हुयी आत्मा को आनन्दमय
कर देते है ब निज ठौर मे बास देते है



 जो व्यक्ति किसी दूसरे के
 चेहरे पर हँसी और जीवन में ख़ुशी
 लाने की क्षमता रखता है ..

मालिक दाता उसके चेहरे से कभी हँसी और जीवन से ख़ुशी कम नहीं होने देता।

       

जब मौन शांत और ध्यान में आती जाती श्वास की पहचान हो



जब मौन शांत और ध्यान में आती जाती श्वास की पहचान हो और पता चले,अब आइ, ठहरी, अब गई, तब इस श्वास में क्या मिश्रित है, भगत या जगत, इसका अहसास और अनुभव होना बहुत ज़रूरी है

हर श्वास पर नाम तो तभी जपा जा सकता है ना जब आती जाती श्वास और उसकी गति की पहचान हो
संतों ने बार बार जुगत का वर्णन किया है

श्वास श्वास की फेरो माला
अगर श्वास तेज़ी से व्यय कर ली तो लेखा किसका देंगे?

पल पल में रहियो सावधान

पल तो श्वास से भी छोटा होता है और उसकी सजगता का हुक्म है तो फिर श्वास तेज़ व्यय होकर अंत तेज़ी से निकट आ रहा है इसकी जानसकारी अत्यंत ज़रूरी नहीं है? इसकी जुगत कि हर श्वास पर नाम का स्मरण मिश्रित हो अत्यंत ज़रूरी है

तेज़ी ना आकर मन में निर्मलता, ग़रीबत,प्रेम,सदाचार का आविर्भाव हो
श्वास धीमी चले बिना किसी टार्गट के क्यूँकि 21600 दम यह तो हमें स्वभाव में मिला है, हम ही मूरख हैं जो व्यथा श्वास खो रहे हैं
श्वास पूँजी है और इसका सही व्यय भगत मार्ग में अत्यंत ज़रूरी है क्यूँकि यही इस प्राणी को मालिक से मिलाने का एकमात्र ज़रिया है

श्वास अत्यधिक धीमे लेना या चढ़ा लेना भी चोरी है
तू तो कुबधी चोर सदा का
ज्ञान में किसके लिए कहा है और क्यूँ यह हम सब जानते हैं

विचार करें

भाई ,श्वास कम निकल रही हैं या तीव्र व्यय हो रही हैं इस बात की सजगता भी नहीं आइ तो कैसे जानेंगे कि श्वास भगत की तरफ़ की निकल रही है या जगत की?
स्वाँसा राखै नाम संग  सुरती रहै समाय
यही मुकत का धाम है  सतगुर दई बताए..


स्वाँस तो हर क्षण मालिक दे रहे है सुरत आपके हुक्म पर टकटकी लगाए रहे कि हर पल हम हुक्मी रहेंगे और यह हुक्म मालिक हम मान पाए ... माने हर समय हुक्मी हो कर रहने की सीख पर चलते रहे
तो हमारी सुरत हुक्मी के हुक्म पर रहेगी जिससे आठौ पहर की बन्दगी सहजता मे हो सकती है ।

ससार में सभी मनुष्य मौजूदा स्थिति में गुण एवं अवगुण दोनों से भरे हुए हैं

ससार में सभी मनुष्य मौजूदा स्थिति में गुण एवं अवगुण दोनों से भरे हुए हैं।न तो कोई ऐसा व्यक्ति है जिसके अंदर सारे गुण भरे हैं अवगुण नहीँ, न ऐसा कोई व्यक्ति है जिसके अंदर केवल अवगुण हों और कोई गुण न हो।अगर सारे गुण हों तो फिर परमहंस बनकर मालिक के पास ही पहुंच जायेगा, सारे अवगुण हों तो जीव बनकर पशु पक्षी की योनि में पहुँच जायेगा।पशु पक्षी के भी अपने गुण अवगुण होते हैं,जो कि हर पशु पक्षी में अलग अलग हैं।

 जब हमारे अंदर गुण अवगुण दोनों ही हैं, तो हमें करना क्या है?हमें अपने विचारों को तराशना है हीरे की भांति जैसे हीरा तराशने के बाद ही मूल्यवान बनता है ऐसे ही हम अपने गुणों को अपने विचार का अंग बनाएं अवगुण तराश कर विचारों से अलग करते जायें।लेकिन यह काम बिना प्रशिक्षण के नहीँ कर सकते, साध संगत नित्य करने से जिस मनुष्य के अंदर सिख भाव होता है,स्वतः प्रशिक्षित होता जाता है।अगर साध संगत में हम प्रोफेसर बनकर नित्य जाते भी हैं तो कुछ नया सीखना मुश्किल हो जाता है।

जब तक गुण अवगुण गड्डमड्ड हैं हमारी कोई कीमत नहीँ।जैसे दो अच्छी और बुरी चीजें मिक्स हो जाएँ उसमें चाहे अच्छी चीज की मात्रा ज्यादा भी हो ,तो भी उसका जो स्वरूप होगा उसे बुरा ही कहा जाता है।यही स्थिति हमारी भी है।हमें अपने ख़राब विचारों को पहिचान कर उनको कूड़ा मानकर नित्यप्रति अन्तःकरण से बाहर फेंकना है, शुध्द विचारों को सहेजना है।यह एक दिन का काम नहीँ प्रतिपल चेतन अवस्था में रहकर करना है।

काम बहुत बाकी है, समय थोड़ा है,अब एक भी पल व्यर्थ न जाए इसका प्रयास और मालिक से प्रार्थना अबिलम्ब शुरू कर दें।अन्यथा इस जीवन को भी व्यर्थ में गवांने के हम और केवल हम ही जिम्मेदार होंगे।फिर मौका मिला या न मिला चौरासी लाख योनियों में अपने विचारों की योग्यता अनुसार भटक रहे होंगे, जिसे सोंचकर भी रूह काँप जायेगी।फैसला हमें ही करना है, फैसले में देरी का कारण हमारा ग़ाफ़िल पन है, ग़ाफ़िल की मार निश्चित है, सचेत रहना ही होगा देरी सिर्फ मेरी तरफ से है।
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बुरे कर्म है लोहे की ज़ंजीर और अच्छे कर्म है सोने की ज़ंजीर

बुरे कर्म है लोहे की ज़ंजीर और अच्छे कर्म है सोने की ज़ंजीर
सही बात है क्यूँकि दोनो कर्म किसी ना किसी स्वार्थवश किए जाते हैं बुरे कर्म सांसारिक फल प्राप्त करने के लिए और अच्छे कर्म उन बुरे कर्मों के दण्ड घटाने और आध्यात्मिक फ़ायदे के मोह के लिए
असल में कर्म ज़ंजीर हैं चाहे सोने की या लोहे की क्यूँकि जब तक कर्म यह समझ कर किए जाते है कि इससे हमें कोई ना कोई लाभ की प्राप्ति करनी है तो पक्का है वो हमारे साथ लग जाते है या यूँ कहें उनके फल हमारे साथ हो जाते है और जब तक उनका निपटारा या न्याय नहीं हो जाता वह हमारे साथ लगे रहते हैं
अकर्म का भाव है जब कर्म तो हो या किया जाए पर उसमें से करता भाव विलुप्त हो जाए यानी यह प्राणी सिर्फ़ ज़रिया मात्र है मालिक के न्याय का और इसे उस कर्म से किसी भी तरह के फल की अभिलाषा नहीं है
हर भाव, विचार, बोल और कर्म के फल हैं और वह फल हमें ज़रूर मिलते हैं पर जब हम समर्पण करके यह बात जान लें कि जो भी हो रहा है वह पहले से निर्धारित है इसलिए अगर हमारे भाव समर्पणमई हैं तो कर्मों से ऊपर उठकर हम सब ज़ंजीरों से बच पाएँ

कर्मों की काई मिट जाई
जब ही सतगुर सहज लखाइ


ध्यान में अपने अंदर में उतरने से हमें कर्मों से दूर हटकर अकर्म और स्वीकार्यता को जानने का अवसर प्राप्त हो सकता है जिससे हमें समझ आ जाए कि सारे कर्म कांड हमें मालिक से नहीं मिला सकते बल्कि स्वीकार्यता हमें मालिक के चरणों में पहुँचा सकती है

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पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा रही थी

पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा
रही थी और पति बार बार उसको अपनी हद में
रहने की कह रहा था
लेकिन पत्नी चुप होने का नाम ही नही ले
रही थी व् जोर जोर से चीख चीखकर कह रही
थी कि
"उसने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी और तुम्हारे
और मेरे अलावा इस कमरें मे कोई नही आया
अंगूठी हो ना हो मां जी ने ही उठाई है।।
बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो
उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा दे
मारा
अभी तीन महीने पहले ही तो शादी हुई थी ।
पत्नी से तमाचा सहन नही हुआ
वह घर छोड़कर जाने लगी और जाते जाते पति
से एक सवाल पूछा कि तुमको अपनी मां पर
इतना विश्वास क्यूं है..??
तब पति ने जो जवाब दिया उस जवाब को
सुनकर दरवाजे के पीछे खड़ी मां ने सुना तो
उसका मन भर आया पति ने पत्नी को बताया
कि
"जब वह छोटा था तब उसके पिताजी गुजर गए
मां मोहल्ले के घरों मे झाडू पोछा लगाकर जो
कमा पाती थी उससे एक वक्त का खाना
आता था
मां एक थाली में मुझे परोसा देती थी और
खाली डिब्बे को ढककर रख देती थी और
कहती थी मेरी रोटियां इस डिब्बे में है
बेटा तू खा ले
मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था
कि मां मेरा पेट भर गया है मुझे और नही
खाना है
मां ने मुझे मेरी झूठी आधी रोटी खाकर मुझे
पाला पोसा और बड़ा किया है
आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूं
लेकिन यह कैसे भूल सकता हूं कि मां ने उम्र के
उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है,
वह मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी
की भूखी होगी ....
यह मैं सोच भी नही सकता
तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो
मैंने तो मां की तपस्या को पिछले पच्चीस
वर्षों से देखा है...
यह सुनकर मां की आंखों से छलक उठे वह समझ
नही पा रही थी कि बेटा उसकी आधी
रोटी का कर्ज चुका रहा है या वह बेटे की
आधी रोटी का कर्ज...

एक व्यक्ति ने ओशो से पूछा मैं आत्महत्या करना चाहता हूँ

एक व्यक्ति ने ओशो  से पूछा मैं आत्महत्या करना चाहता हूँ
.सुनिए ओशो का जबाब।
तो पहले संन्यास ले लो . और तुम्हे आत्महत्या करने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी , क्योंकि संन्यास लेने से बढ़ कर कोई आत्महत्या नही है . और किसी को आत्महत्या क्यों करनी चाहिए ? मौत तो खुद बखुद आ रही है —तुम इतनी जल्दबाजी में क्यों हो ? मौत आएगी , वो हमेशा आती है . तुम्हारे ना चाहते हुए भी वो आती है . तुम्हे उसे जाकर मिलने की ज़रुरत नहीं है , वो अपने आप आ जाती है .पर तुम अपने जीवन को बुरी तरह से miss करोगे . तुम क्रोध , या चिंता की वजह से suicide करना चाहते हो . मैं तुम्हे real suicide सिखाऊंगा . एक सन्यासी बन जाओ .
और ordinary suicide करने से कुछ ख़ास नहीं होने वाला है . , आप तुरंत ही किसी और कोख में कहीं और पैदा हो जाओगे . कुछ बेवकूफ लोग कहीं प्यार कर रहे होंगे , याद रखो ..तुम फिर फंस जाओगे .. तुम इतनी आसानी से नहीं निकल सकते —बौहुत सारे बेवकूफ हैं . इस शरीर से निकलने से पहले तुम किसी और जाल में फंस जाओगे . और एक बार फिर तुम्हे school., college , university जाना पड़ेगा – जरा उसके बारे में सोचो . उन सभी कष्ट भरे अनुभवों के बारे में सोचो — वो तुम्हे suicide करने से रोकेगा .
तुम जानते हो , Indians इतनी आसानी से suicide नहीं करते , क्योंकि वो जानते हैं कि वो फिर पैदा हो जायेंगे , West में suicide और suicidal ideas exist करते हैं ; बहुत लोग suicide करते हैं , और psychoanalyst कहते हैं कि बहुत कम लोग होते हैं जो ऐसा करने का नहीं सोचते हैं . दरअसल एक आदमी ने investigate कर के कुछ data इकठ्ठा किया था , और उसका कहना है कि – हर एक व्यक्ति अपने जीवन में कम से कम 4 बार suicide करने को सोचता है . पर ये West की बात है , East में , चूँकि लोग पुनर्जन्म के बारे में जानते हैं इसलिए कोई suicide नहीं करना चाहता है – फायदा क्या है ? तुम एक दरवाज़े से निकलते हो और किसी और दरवाजे से फिर अन्दर आ जाते हो . तुम इतनी आसानी से नहीं जा सकते .
मैं तुम्हे असली आत्महत्या करना सिखाऊंगा , तुम हमेशा के लिए जा सकते हो . इसी का मतलब है बुद्ध बनना – हमेशा के लिए चले जाना .
तुम suicide क्यों करना चाहते हो ? शायद तुम जैसा चाहते थे life वैसी नहीं चल रही है ? पर तुम ज़िन्दगी पर अपना तरीका , अपनी इच्छा थोपने वाले होते कौन हो ? हो सकता है तुम्हारी इच्छाएं पूरी ना हुई हों ? तो खुद को क्यों ख़तम करते हो अपनी इच्छाओं को ख़तम करो .हो सकता है तुम्हारी expectations पूरी ना हुई हों , और तुम frustrated feel कर रहे हो . जब इंसान frustration में होता है तो वो destroy करना चाहता है . और तब केवल दो संभावनाएं होती हैं —या तो किसी और को मारो या खुद को . किसी और को मारना खतरनाक है , इसलिए लोग खुद को मारने का सोचने लगते हैं . लेकिन ये भी तो एक murder है !! तो क्यों ना ज़िन्दगी को ख़तम करने की बजाये उसे बदल दें !!!