बोधिधर्म भारत के बाहर गया। और जब वह चीन पहुंचा, तो वहां के सम्राट ने कहा कि मैंने हजारों विहार बनवाए;

बोधिधर्म भारत के बाहर गया। और जब वह चीन पहुंचा, तो वहां के सम्राट ने कहा कि मैंने हजारों विहार बनवाए; लाखों भिक्षुओं को मैं भिक्षा देता हूं रोज; बुद्ध के समस्त शास्त्रों का मैंने चीनी भाषा में अनुवाद करवाया है; लाखों प्रतियां मुफ्त बंटवाई हैं; धर्म का मैंने बड़ा प्रचार किया है; हे बोधिधर्म, इस सब से मुझे क्या लाभ होगा? मुझे क्या मिलेगा इसका पुरस्कार? इसका प्रतिफल क्या है?
उसने गलत आदमी से पूछ लिया। और भिक्षु थे लाखों, जो उसकी भिक्षा पर पलते थे। वे कहते थे, तुम पर परमात्मा की बड़ी कृपा है। तुम्हारा मोक्ष सुनिश्चित है। हे सम्राट, तुम जैसा सम्राट पृथ्वी पर कभी न हुआ और न कभी होगा। तुम धर्म के परम मंगल को पाओगे। तुम पर आशीष बरस रहे हैं बुद्धों के। तुम्हें दिखाई नहीं पड़ते, देवता फूल बरसाते हैं तुम पर। उसने सोचा कि बोधिधर्म भी ऐसा ही भिक्षु है। गलती हो गई। बोधिधर्म जैसे आदमी कभी-कभी होते हैं, इसलिए गलती हो जाती है।
बोधिधर्म ने कहा, बंद कर बकवास! अगर पहले कुछ मिलता भी, तो अब कुछ नहीं मिलेगा। तूने मांगा कि खो दिया। सम्राट तो बेचैन हो गया। हजारों भिक्षुओं की भीड़ के सामने बोधिधर्म ने कहा कि कुछ भी नहीं मिलेगा। फिर भी उसने सोचा कि कुछ गलती हो गई समझने में बोधिधर्म के या मेरे। उसने कहा, इतना मैंने किया, फल कुछ भी नहीं! बोधिधर्म ने कहा, फल की आकांक्षा पाप है। किया, भूल जा! इस बोझ को मत ढो, नहीं तो इसी बोझ से डूब मरेगा। पाप के बोझ से ही लोग नहीं डूबते, पुण्य के बोझ से भी डूब जाते हैं। बोझ डुबाता है। और पाप से तो आदमी छूटना भी चाहता है; पुण्य को तो कस कर पकड़ लेता है। यह पत्थर है तेरे गले में; इसको छोड़ दे।
लेकिन सम्राट वू को यह बात पसंद न पड़ी। हमारी वासनाओं को यह बात पसंद पड़ भी नहीं सकती। इतना किया, बेकार! सम्राट वू को पसंद न पड़ी, तो बोधिधर्म ने कहा कि मैं तेरे राज्य में प्रवेश नहीं करूंगा, वापस लौट जाता हूं। क्योंकि मैं तो सोच कर यह आया था कि तूने धर्म को समझ लिया होगा, इसलिए तू धर्म के फैलाव में आनंदित हो रहा है। मैं यह सोच कर नहीं आया था कि तू धर्म के साथ भी सौदा कर रहा है। मैं वापस लौट जाता हूं।
और बोधिधर्म वू के साम्राज्य में प्रवेश नहीं किया, नदी के पार रुक गया। वू को बड़ी बेचैनी हुई, सम्राट को। बड़े दिनों से प्रतीक्षा की थी इस आदमी की। यह बुद्ध की या लाओत्से की हैसियत का आदमी था। और उसने इस भांति निराश कर दिया। उसने सब जार-जार कर दिया उसकी आकांक्षाओं को। अगर यह एक सील-मुहर लगा देता और कह देता, हां सम्राट वू, तेरा मोक्ष बिलकुल निश्चित है; सिद्ध-शिला पर तेरे लिए सब आसन बिछ गया है; तेरे पहुंचने भर की देर है। द्वार खुले हैं; स्वागत के लिए बैंड-बाजे सब तैयार हैं। तो वू बहुत प्रसन्न होता।
हमारी वासनाएं ही अगर हमारी प्रसन्नता हैं, तो धर्म के जगत में हमारे लिए कोई प्रवेश नहीं है। अगर निर्वासना होना ही हमारी प्रसन्नता है, तो ही प्रवेश हो सकता है। निर्वासना धर्म के लिए बहुत विचारणीय है। क्षुद्र वासनाओं के त्याग की बात नहीं है। गहन वासनाएं मन को पकड़े हुए हैं।
बुद्ध के पास एक आदमी आता है और वह कहता है, मैं ध्यान करूं, साधना करूं, आप जैसा कब तक हो जाऊंगा? बुद्ध ने कहा, जब तक तुझे यह खयाल रहेगा कि मेरे जैसा कब तक हो जाएगा, तब तक होना मुश्किल है। यही खयाल बाधा है। इस खयाल को छोड़ दे। ध्यान कर। इस खयाल से, इस वासना से नहीं कि बुद्ध जैसा कब तक हो जाऊंगा।
बुद्ध से कोई आकर पूछता है कि आपके इन दस हजार भिक्षुओं में कितने लोग ऐसे हैं, जो आप जैसे हो गए? तो बुद्ध कहते हैं, बहुत लोग हैं। तो वह आदमी कहता है, लेकिन उनका कुछ पता नहीं चलता। तो बुद्ध कहते हैं, उनको खुद अपना पता नहीं रहा है। तो वह आदमी पूछता है, लेकिन आपका तो पता चलता है और आप जैसा तो कोई नहीं दिखाई पड़ता! बुद्ध ने बड़े मजे की बात कही। बुद्ध ने कहा कि मैंने शिक्षक होने के लिए कुछ पाप-कर्म पिछले जन्म में किए थे, वे पूरे कर रहा हूं। शिक्षक होने के लिए–टु बी ए टीचर–वे पाप-कर्म मैंने किए थे।
जैनों में तो पूरा सिद्धांत है उसके लिए कि कुछ कर्मों के कारण व्यक्ति को तीर्थंकर का जन्म मिलता है–कुछ कर्मों के कारण। कुछ कर्मों का आखिरी बंधन उसको तीर्थंकर बनाता है। और तब अपना बंधन काटने के लिए उसे लोगों को समझाना पड़ता है।
तो बुद्ध ने कहा, मैंने कुछ कर्म किए थे कि शिक्षक होने का उपद्रव मुझे झेलना पड़ेगा। वह मैं झेल रहा हूं। अपने-अपने किए का फल है। उन्होंने नहीं किया था। वे बिलकुल खो गए हैं और शून्य हो गए हैं। समझाने के लिए भी उनके भीतर कोई नहीं है कि जो समझाए। सब खो गया है।
और जब इतना सब खो जाता है–वासना नहीं, कोई स्वार्थ नहीं–तब जिस शून्य का उदय होता है, वही स्वभाव है, वही ताओ है।...osho

एक बार की बात है। एक नवविवाहित जोड़ा किसी किराए के घर में रहने पहुंचा





एक बार की बात है। एक नवविवाहित जोड़ा किसी किराए के घर में रहने पहुंचा। अगली सुबह, जब वे नाश्ता कर रहे थे, तभी पत्नी ने खिड़की से देखा कि सामने वाली छत पर कुछ कपड़े फैले हैं – “लगता है इन लोगों को कपड़े साफ़ करना भी नहीं आता … ज़रा देखो तो कितने मैले लग रहे हैं?’’

पति ने उसकी बात सुनी पर अधिक ध्यान नहीं दिया।
एक-दो दिन बाद फिर उसी जगह कुछ कपड़े फैले थे। पत्नी ने उन्हें देखते ही अपनी बात दोहरा दी…. “कब सीखेंगे ये लोग कि कपड़े कैसे साफ़ करते हैं…!!”
पति सुनता रहा पर इस बार भी उसने कुछ नहीं कहा।

पर अब तो ये आए दिन की बात हो गई, जब भी पत्नी कपड़े फैले देखती भला-बुरा कहना शुरू हो जाती।

लगभग एक महीने बाद वे नाश्ता कर रहे थे। पत्नी ने हमेशा की तरह नजरें उठाईं और सामने वाली छत की तरफ देखा, “अरे वाह! लगता है इन्हें अकल आ ही गयी…

 आज तो कपड़े बिलकुल साफ़ दिख रहे हैं, ज़रूर किसी ने टोका होगा!”

पति बोला, “नहीं उन्हें किसी ने नहीं टोका।”

“तुम्हे कैसे पता?”  पत्नी ने आश्चर्य से पूछा।

“आज मैं सुबह जल्दी उठ गया था और मैंने इस खिड़की पर लगे कांच को बाहर से साफ़ कर दिया, इसलिए तुम्हें कपड़े साफ़ नज़र आ रहे हैं।”

ज़िन्दगी में भी यही बात लागू होती है। बहुत बार हम दूसरों को कैसे देखते हैं ये इस पर निर्भर करता है कि हम खुद अन्दर से कितने साफ़ हैं।

किसी के बारे में भला-बुरा कहने से पहले अपनी मनोस्थिति देख लेनी चाहिए और खुद से पूछना चाहिए कि क्या हम सामने वाले में कुछ बेहतर देखने के लिए तैयार हैं या अभी भी हमारी खिड़की साफ करनी बाकी है।



यह संसार शंकाओं से भरा हुआ है

अहु मेट कै भगत करैला सो सत सेती प्रेम घरैला‬: अहम ही हमारे अंदर की सारी बुराइयों की जड़ है । हमारा अहम हमें भगत मार्ग  पर आगे बढने से रोकता है । अपने अंदर से इसे निकाल कर देखें, हम स्वयं को कितना हल्का महसूस करने लगेंगे और मालिक तक पहुँचने का मार्ग कितना सुगम दिखाई पड़ने लगेगा ।

सतनाम

।।गुरू महारे दिया दुनी मे हेला ।।

यह संसार शंकाओं से भरा हुआ है ।
इन्सान पूरा जीबन अपनी तारीफ़ की चाह मे निकाल देता है पर तारीफ़ उसको मरने के बाद मिलती है ....

जो महापुरुष हुये उनके ज़िन्दा पर ज़हर दिया जाता है सूली पर लटकाया जाता है  गोली मार दी जाती है.......
और बाद मे उन महापुरुष की पूजा करने लगते है ..

यह संसार सब सपना है ...  और हम अहंकार की नींद मे सो जाते है। इसमे जो जग गया मालिक की दया से बही इसके कष्ट से बच पायगे ..
मालिक का हेला इस संसार मे प्रत्येक पल हो रहा है अपने बनाए हुए बन्दों के लिये शब्द के रूप मे ...
जो साध उस शबद से लग जायगा मालिक उसकी चेतना को जागरत कर देगे ।

।।चेतन कर चौरासी मेटी
गुरू म्हारे लाए गत का गैला ।।
सतनाम

रख हौंसला वो मंज़र भी आयेगा, प्यासे के पास चलकर समंदर भी आयेगा !!

●●रख हौंसला वो मंज़र भी आयेगा,
                    प्यासे के पास चलकर,
                         समंदर भी आयेगा !!
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●●थक कर ना बैठ ऐ,
                        मंजिल के मुसाफ़िर।    मंजिल भी मिलेगी और
              जीने का मजा भी आयेगा !!!
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●●क्या हुआ तुमको जो दौलत मिल गयी,
वो सिकंदर भी ख़ाली हाथ गया था।
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●● "जिनकी आंखें आंसू से नम नहीं,
 क्या समझते हो उसे कोई गम नहीं।
    तुम तड़प कर रो दिये तो क्या हुआ, गम छुपा के हंसने वाले भी कम नहीं"
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●●खुद की पहचान बनाने में इतना
                                समय लगा दो।
 की किसी और की निंदा का समय
                                     ही ना हो।।
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●●प्रेम चाहिये तो,
               समर्पण खर्च करना होगा।
विश्वास चाहिये तो,
                    निष्ठा खर्च करनी होगी।
साथ चाहिये तो,
                  समय खर्च करना होगा।
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●●किसने कहा रिश्ते मुफ्त मिलते हैं,
           मुफ्त तो हवा भी नहीं मिलती।
एक साँस भी तब आती है,
          जब एक साँस छोड़ी जाती है।।
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●●अजीब तरह के लोग हैं,
                                इस दुनिया मे।
अगरबती भगवान के लिए खरीदते हैं,
                           और खुशबू ,
खुद की पसंद की तय करते है।
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●●पिताजी ने ये बोलकर,
               घर की चौखट रखी छोटी।
कि बेटा,
       झुकने से ही ऊँचाईया मिलती है।

हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है

हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है। यदि हम बुरी सोच के साथ बोलेंगे  या काम करेंगे  , तो हमें  कष्ट ही मिलेगा है। यदि हम  शुद्ध विचारों के साथ बोले या काम करे , तो परछाई की तरह  ही प्रसन्नता हमारा साथ कभी नहीं छोडेगी।

हम जो कुछ भी है
दोनों ही बिचार बहुत ही सही है








जीवन में कभी भी किसी से अपनी तुलना मत करो....

हम जैसे हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं....
क्योंकि,
दाता की  की हर रचना अपने आप में सर्वोत्तम है, अदभुत है.....
और,
उस रचना में किन्तु परन्तु करना, इंसान के अधिकार क्षेत्र में है ही नहीं।सूरज भान साध की आत्मा को मालिक सदगति दे ब परिबार को ब शान्त रहने की शक्ति प्रदान करे ।
मालिक दाता इतने दयालु है कि इसी पाँच तत्व के शरीर मे जिसमें मल मूत्र मास मज्जा है उसी पाँच तत्व के शरीर मे मालिक ने आत्मा ब्रह्म रखा जो कि सबसे शुद्ध है और उस आत्मा मे मालिक ने अपना ज्ञान परघट किया ।

प्रभु न दंड देता है प्रभु न माफ करता है

प्रभु न दंड देता है
प्रभु न माफ करता है ।
वह तो कर्म - फल तराजू है
जो बस इन्साफ करता है ॥
सुख - दुःख का बटन
तेरे हाथ में है बन्दे ।
तू खुद ही On करता है
तू खुद ही Off करता है ॥

 �� सत्तनाम��