वास्तव में मनुष्य अपना ही उद्धार कर सकता है, दूसरों का नहीं कर सकता । दूसरों का उद्धार अपने हाथ में नहीं है । हम सम्मति दे सकते हैं, अपनी बात कह सकते हैं, पर उद्धार स्वयं करेगा, तभी होगा । हम उद्धार कर दें - यह बात नहीं है । सदा से ही यही बात है कि खुद के चाहने से, खुद के करने से ही उद्धार होता है ।
अगर संसार को अपना न मान कर, उससे कुछ न चाह कर सत् करतार को अपना मान लें तो इसी क्षण अनन्त जन्मों के पाप छूट जायेंगे ।